चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा
मेरे एक मित्र ने एक ’क़ता’[क़िता’] लिखा और उसका वज़न लिखा--
22--22--22--2
और जानना चाहा कि ’साढ़े तीन’ रुक्न पर यह क़ता हुआ कि नहीं ?
यह चर्चा इसी ’साढ़े-तीन’ रुक्न पर है।
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मित्र ने -22- को शायद एक रुक्न मान लिया और -2- को आधा रुक्न समझ लिया होगा ।
आप जानते है-
-रुक्न या तो सालिम होगा [अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] या फिर मुज़ाहिफ़ [ ज़िहाफ़ शुदा ] होगा अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] उसका नाम भी होगा।कोई रुक्न ’ अपने पूरे शकल और वज़न में होता है। आधा --डेढ़ा--पौना--ढैया-- नही होता।
चाहे 2 हो, 22 हो, 222 हो, ये सब Independent रुक्न है वज़न है और इनके नाम भी हैं। हम यह नहीं कह सकते कि -2- रुक्न -22- का आधा है या 222 का एक तिहाई है।
112---1212---121---12--1122- आदि-ये सब रुक्न किसी न किसी सालिम रुक्न के मुज़ाहिफ़ शकल है और अपनी Independent हैसियत रखते है। ये किसी सालिम रुक्न के न अद्धा है न पौना।
एक स्थिति की कल्पना कीजिए
22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसद्दस बह्र।
22-22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसम्मन बह्र।
तो
22-22-22-2 को आप क्या कहेंगे?
डेढ मुसद्दस या साढ़े मुसद्दस या पौना मुसम्मन?
यह भी एक मुसम्मन बह्र ही होगी। अद्धा--डेढ़ा--पौना रुक्न नही ।
इस -"साढ़े तीन रुक्न"-पर मित्र का अगला तर्क था-तो -फिर मीर की बहर साढ़े सात रुकनी और साढ़े पांच रुकनी क्यूँ कहते हैं ?
मेरा जवाब था--भाई मैं तो नहीं कहता। अरूज़ की किताब भी यह बात नहीं कहती। कौन लोग कहते हैं ,मालूम नहीं। वैसे हर मोड़ पर
किरदार बहुत हैं, कहते होंगे।
मीर की बह्र हमेशा 16-रुक्नी होती है और उसकी मूल बह्र यूँ होती है--
21-121-121-122// 21-121-121-12 यानी 16//14
इसमें तो कही साढ़े सात या साढ़े पाँच रुक्न दिखाई नहीं दे रहा है
बाएँ साइड मे-4 रुक्न और दाएँ साइड में भी -4 रुक्न यानी एक मिसरा में -8- रुक्न मुकम्मल दिखाई दे रहा है।
ख़ैर
-2- का नाम -फ़ा- भी और फ़े’अ भी [ फ़े-ऐन बसकून यानी -ऎन साकिन ] हो सकता है। यह सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है।
एक दिलचस्प बात और --इन अर्कान को अरबी में -अफ़ाइल-[फ़े’ल -यानी फ़े--एन---लाम ] भी कहते है॥
क्यों?
क्यों कि हमारे जितने भी सालिम या मुज़ाहिफ़ रुक्न हैं उनके नाम में--उसमें इन 3-हर्फ़[ फ़े--एन---लाम] में से -2- हर्फ़ ज़रूर मिलेंगे।
चाहे वह फ़ऊल [122] हो---फ़ाइलुन [212] हो -मुस्तफ़इलुन [2212] हो या कोई और।--फ़े-एन-लाम में से कोई न कोई 2 हर्फ़ ज़रूर आप को मिलेगा।
न हो तो आप चेक कर लें। यहाँ तक कि -222--[ मफ़-ऊ-लुन ] भी ।
यही बात मुज़ाहिफ़ रुक्न में भी है। ज़िहाफ़ लगाने से सालिम रुक्न की शक्ल-ओ-सूरत बदल जाती है कतर-ब्योंत हो जाती है तो फिर उसे किसी standard मान्य और मानूस रुक्न से बदल लेते हैं जिसमें -फ़े--एन---लाम में से कोई -2- हर्फ़ ज़रूर हो
इसीलिए मैन -2- को फ़े-अ’ [ ऐन साकिन] लिखा। हालाँकि -फ़ा [2] भॊ कोई बुरा नहीं है।
[ मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लतबयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी निशानदिही फ़रमाएँ कि यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके।
सादर
-आनन्द पाठक-’आनन’-