Friday, 28 August 2026

चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा


चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा

मेरे एक मित्र ने एक ’क़ता’[क़िता’] लिखा और उसका वज़न लिखा--

22--22--22--2

और जानना चाहा कि ’साढ़े तीन’ रुक्न पर यह क़ता हुआ कि नहीं ?


यह चर्चा इसी ’साढ़े-तीन’ रुक्न पर है।

----

मित्र ने -22- को शायद एक रुक्न मान लिया और -2- को आधा रुक्न समझ लिया होगा ।

आप जानते है-

-रुक्न या तो सालिम होगा [अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] या फिर मुज़ाहिफ़ [ ज़िहाफ़ शुदा ] होगा अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] उसका नाम भी होगा।कोई रुक्न ’ अपने पूरे शकल और वज़न में होता है। आधा --डेढ़ा--पौना--ढैया-- नही होता।

चाहे 2 हो, 22 हो, 222 हो, ये सब Independent रुक्न है वज़न है और इनके नाम भी हैं। हम यह नहीं कह सकते कि -2- रुक्न -22- का आधा है या 222 का एक तिहाई है।


112---1212---121---12--1122- आदि-ये सब रुक्न किसी न किसी सालिम रुक्न के मुज़ाहिफ़ शकल है और अपनी Independent हैसियत रखते है। ये किसी सालिम रुक्न के न अद्धा है न पौना।


एक स्थिति की कल्पना कीजिए


22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसद्दस बह्र।

22-22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसम्मन बह्र।

तो

22-22-22-2 को आप क्या कहेंगे?

डेढ मुसद्दस या साढ़े मुसद्दस या पौना मुसम्मन?

यह भी एक मुसम्मन बह्र ही होगी। अद्धा--डेढ़ा--पौना रुक्न नही ।

इस -"साढ़े तीन रुक्न"-पर मित्र का अगला तर्क था-तो -फिर मीर की बहर साढ़े सात रुकनी और साढ़े पांच रुकनी क्यूँ कहते हैं ?

मेरा जवाब था--भाई मैं तो नहीं कहता। अरूज़ की किताब भी यह बात नहीं कहती। कौन लोग कहते हैं ,मालूम नहीं। वैसे हर मोड़ पर

किरदार बहुत हैं, कहते होंगे।

मीर की बह्र हमेशा 16-रुक्नी होती है और उसकी मूल बह्र यूँ होती है--

21-121-121-122// 21-121-121-12 यानी 16//14


इसमें तो कही साढ़े सात या साढ़े पाँच रुक्न दिखाई नहीं दे रहा है

बाएँ साइड मे-4 रुक्न और दाएँ साइड में भी -4 रुक्न यानी एक मिसरा में -8- रुक्न मुकम्मल दिखाई दे रहा है।

ख़ैर

-2- का नाम -फ़ा- भी और फ़े’अ भी [ फ़े-ऐन बसकून यानी -ऎन साकिन ] हो सकता है। यह सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है।


एक दिलचस्प बात और --इन अर्कान को अरबी में -अफ़ाइल-[फ़े’ल -यानी फ़े--एन---लाम ] भी कहते है॥

क्यों?

क्यों कि हमारे जितने भी सालिम या मुज़ाहिफ़ रुक्न हैं उनके नाम में--उसमें इन 3-हर्फ़[ फ़े--एन---लाम] में से -2- हर्फ़ ज़रूर मिलेंगे।

चाहे वह फ़ऊल [122] हो---फ़ाइलुन [212] हो -मुस्तफ़इलुन [2212] हो या कोई और।--फ़े-एन-लाम में से कोई न कोई 2 हर्फ़ ज़रूर आप को मिलेगा।

न हो तो आप चेक कर लें। यहाँ तक कि -222--[ मफ़-ऊ-लुन ] भी ।

यही बात मुज़ाहिफ़ रुक्न में भी है। ज़िहाफ़ लगाने से सालिम रुक्न की शक्ल-ओ-सूरत बदल जाती है कतर-ब्योंत हो जाती है तो फिर उसे किसी standard मान्य और मानूस रुक्न से बदल लेते हैं जिसमें -फ़े--एन---लाम में से कोई -2- हर्फ़ ज़रूर हो

इसीलिए मैन -2- को फ़े-अ’ [ ऐन साकिन] लिखा। हालाँकि -फ़ा [2] भॊ कोई बुरा नहीं है।


[ मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लतबयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी निशानदिही फ़रमाएँ कि यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके।

सादर

-आनन्द पाठक-’आनन’-

Thursday, 27 August 2026

क़िस्सा 007: एक दिलचस्प किस्सा ज़फ़र गोरखपुरी साहब का

 किस्सा 007 : ज़फ़र गोरखपुरी साहब का एक दिलचस्प किस्सा


देखें क़रीब से तो अच्छा दिखाई दे

इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे ।


यह शे’र "ज़फ़र गोरखपुरी" साहब का है। आप का पूरा नाम ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र था और आप तहसील बाँसगाँव, जिला गोरखपुर में 1935 में पैदा हुए थे। आप अपने समय के एक उम्दा और ज़हीन शायर थे। आप ने बम्बई [मुम्बई] में हिंदी फ़िल्मों में कुछ गीत भी लिखे मगर कोई ख़ास कामयाबी न मिली।


इनके कुछ शे’र बड़े मशहूर हुए। 1-2 बानगी देखें--


ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे

ये सब थे भीख मेरे साथ माँगने वाले।


या यह फिर-


कितनी आसानी से मशहूर किया है ख़ुद को

मैने अपने से बड़े शख़्स को गाली दी है।


देखिए एक शायर कितना दूर का सोचता है। उक्त शे’र का अमल हाल ही में काकरोच पार्टी के ’ज़ेन-जी’ वालों ने बेझिझक खुल्लम खुल्ला किया जो आप सब जानते ही है। अगर मशहूर होने का यही रास्ता है तो तौबा तौबा।

ख़ैर


खलीक़ुज़्ज़मा ’नुसरत’ साहब ने ज़फ़र साहब का एक दिलचस्प किस्सा अपनी किताब ; बरम्हल अश’आर/ ज़बानज़द अश’आर में बयान किया है । आप ने ऊपर भीख मांगने वाला शेर सुना। एक ऐसा ही शे’र उनका और है।

किस्सा कोताह यह कि --


ज़फ़र साहब एक मुशायरे में अपना एक शे’र--


अब भीख माँगने के तरीक़े बदल गए

लाज़िम नहीं की हाथ में कासा दिखाई दे।


[कासा = भिक्षा पात्र, भीख माँगने का कटोरा]


यह शे’र उपस्थित श्रोताओं को इतना अच्छा लगा कि मुकर्रर मुकर्र कहने लगे वाह वाह करने लगे और ज़फ़र साहब से यही शे’र बार बार पढ़वा रहे थे। एक सज्जन अपनी कार में बैठे यह शे’र सुन रहे थे। उन्हे भी यह शे;र इतना पसन्द आया कि अपनी कार से उतर कर सीधे स्टेज पर गए और ज़फ़र साहब को 10/- का नोट थमा दिया ।

फिर क्या था। पूरी महफ़िल में हँसी का फ़ौव्वारा छूट गया।


कभी कभी मुशायरे/महफ़िल में ऐसी घट्ना हो जाती है कि पूरा माहौल ही बदल जाता है।


प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


Tuesday, 25 August 2026

चर्चा 006 : "तू इधर उधर की न बात कर--

 एक चर्चा : "तू इधर उधर की न बात कर--


तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे

तेरी रहबरी का सवाल है, मुझे राहज़न  से ग़रज़ नहीं ।


 दर अस्ल यह शे’र "शहाब ज़ाफ़री" साहब का है।


सैय्यद वक़ार अहमद शहाब ज़ाफ़री साहब की पैदाईश जौनपुर [उ0प्र0] में हुई थी।

आजकल इस शे’र के कई रूप और कई वर्जन मिलते है। यह शे’र इतना मानीखेज़ [अर्थ पूर्ण] है कि लोग बाग मौक़े दर मौके

अपने अपने हिसाब से पढ़ते, सुनाते रहते हैं।

कहते हैं यह शे’र सबसे पहले पार्लियामेन्ट में मौलाना आज़ाद साहब ने जवाहर लाल नेहरू जी को संबोधित कर के पढ़ा था। उस वक्त ज़ाफ़री साहब की उम्र

71-साल की थी। सुषमा स्वराज जी ने भी यह शे’र एक बार संसद में किसी मौक़े पर पढ़ा था। अब तो नेतागण प्राय:मौक़े दर मौक़े समय समय पर संसद में.

 विधान सभा मे, टी0वी0 बहस मे पढ़ते रहते है जब किसी को कटघरे में खड़ा करना होता है। ख़ैर , सिद्धू साहब तो कई बार बेमौक़े भी पढ़ देते हैं 

 और अन्त में कहते हैं--ठोंको ताली।

ऐसे शे’र जब इतने मशहूर और मक़्बूल हो जाते है तब समय के अन्तराल पर इसके रूप मे कुछ बदलाव भी आ जाता है, विकॄति आ जाती है । जैसे

इसका एक रूप यह भी है-आप ने भी सुना होगा---


तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा     

तेरी रहबरी का सवाल है, मुझे राहज़न  से ग़रज़ नहीं ।


 यानी काफ़िले की जगह --काफ़िला --[एकवचन]

या फ़िर 

       तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा     

मुझे रहजनों से गिला नहीं ,तेरी रहबरी  का सवाल  है ।


यानी 

राहज़न की जगह--- रहज़नों--

ग़रज़ [12]  की जगह -गिला-[12]

और तो और मिसरा सानी को ही उलट दिया --यानी जिसको जिसमे सुविधा होती है --अपने हिसाब से इस शे’र को पढ़ता है।

आप ने अगर इस शे’र का कोई और version सुना हो तो ज़रूर बताइएगा।

बात जो भी हो शे’र का मफ़हूम बहुत साफ़ है--मानूस है--लोकप्रिय है।

अन्त में --शे’र वही जो जन जन को भावे--


प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा

चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा मेरे एक मित्र ने एक ’क़ता’[क़िता’] लिखा और उसका वज़न लिखा-- 22--22--22--2 और जानना चाहा कि ’ साढ़े तीन’...