:1:
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवज़ह उदासी का सबब पूछेंगे ।
- कफ़ील अहमद ’कफ़ील’-
:2:
मैं घर में भी उससे मिलती कैसे
दीवार खड़ी थी घर के अंदर ।
किश्वर नाहीद [ शायरा]
शायरी 010
ये सच है किसी हाथ में पत्थर नहीं लेकिन
महफ़ूज़ नहीं कोई भी सर देख रहा हूँ ।
-इज़हार अहमद ’ नदीम-
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यही हुजूम तो रस्ते को रोकता है कभी
इसी हुजूम से रस्ता निकलता रहता है ।
-अज़हर इनायती-
अन्य अश’आर यहाँ सुनें--
क़िस्सा 006 : मीर तक़ी मीर ---चुम्मा चाटी शायरी
मीर तक़ी ”मीर’ को ख़ुदा-ए-सुख़न भी कहा जाता है और यह लकब उन्हें यूँ ही नहीं दिया गया है
या यूँ ही नहीं कहा जाता है। बड़े बड़े उस्ताद शायर भी उनकी शायरी का लोहा मानते थे।
नासिख़ अपने ज़माने के मशहूर शायर थे । उन्होने मीर के मुतल्लिक़ एक मिसरा कहा था -
-आप बेहरा हैं जो मो’तक़िद-ए- "मीर’ नही--
इसी मिसरे का हवाला देते हुए ;ग़ालिब’ ने यह शे’र कहा था--
’ग़ालिब’ अपना तो अक़ीदा है ब-कौले-’नासिख़’
-आप बेहरा हैं जो मो’तक़िदे- "मीर’ नहीं ।
जब कि ग़ालिब साहब ख़ुद एक उस्ताद शायर थे अपने ज़माने के मशहूर शायर थे ।
ज़ौक़ ख़ुद एक उस्ताद शायर थे, मीर के बारे में यह कहा--
न हुआ पर न हुआ ’मीर’ का अंदाज़ नसीब
’ज़ौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा ।
कहने का मतलब यह कि ’मीर’ को लोग ख़ुदाए-सुखन यूँ हीं नहीं कहते। ’मीर’ साहब गंभीर और बुलंद ख़याल की शायरी करते थे। शायरी को शायरी की तरह करते थे। उनकी ग़ज़लें अश;आर मानीख़ेज़ हुआ करती थीं। उन्होने ज़िंदगी में बड़े कष्ट उठाए, ज़िंदगी ग़मगीन रही।
एक बार एक मुशायरे में जुर्रत साहब और मीर साहब शामिल थे। [जुर्रत साहब के बारें में एक किस्सा पहले ही बयान कर चुका हूँ] जुर्रत साहब ने मुशायरे में एक ग़ज़ल पढ़ी। जिसकी खूब तारीफ़ हुई। दाद-ओ-तहसीन हासिल हुआ। वाह वाह हुई। मगर मीर साहब चुपचाप बैठे रहे। मगर जुर्रत को मुशायरे में मिली दाद वाह वाह काफ़ी मालूम न हुई तो वह मीर साहब के पास आ कर बगल में बैठ गए और अपनी पढ़ी हुई ग़ज़ल के बारे में मीर साहब की राय जाननी चाही।
मीर साहब कुछ कहना नहीं चाहते थे , सो टाल-मटोल करते रहे। हाँ-हूँ करते रहे। मगर जुर्रत तो जुर्रत। पीछे ही पड़ गए तो मीर साहब को गुस्सा आ गया और बोल उठे--"मियाँ ! क़ैफ़ियत इसकी यह है कि तुम शे’र तो कहना नहीं जानते , बस अपनी ’चुम्मा चाटी’ कह लिया करो।
बाद में जुर्रत साहब की क्या शकल हुई होगी ख़ुदा जाने।
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ऐसे मसले पर आज भी वैसे भी और सोशल मीडिया पर बहुत से जुर्रत है -- और मीर भी है
1-2 ग़ज़ल कही नहीं कि तुरन्त किसी "दद्दा" के पास आकर बैठ गए फिर लगते है पूछने -दद्दा शे’र कैसा रहा,
ग़ज़ल कैसी रही? और ’दद्दा’ भी अपनी जान छुड़ाने की ग़रज़ से - अच्छा रहा- कह देते है ।
फिर क्या दूसरे दिन वो दिन भर सारे मंच पर फ़ेसबुक पर, व्हाटस अप पर , बात चस्पा करते रहते है फोटू लगाते रहते है ,मार्केटिंग करते रहते है- -इस शे’र को दद्दा ने आशीर्वाद दिया--इस ग़ज़ल पर दद्दा ने भी वाह वाह किया ब्ला ब्ला ब्ला।आप भी सुनें---
कहने का मतलब यह कि यह रोग आज से नहीं ,ज़माने से है।
प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द.पाठक’आनन’
शायरी 011 :1: बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी लोग बेवज़ह उदासी का सबब पूछेंगे । - कफ़ील अहमद ’कफ़ील’- :2: मैं घर में भी उससे मिलती कैसे दीवा...