क़िस्सा 001: गिरते है शह सवार ही--
यह शे’र आप ने ज़रूर सुना होगा-
गिरते हैं शहसवार ही मैदाने-ए-जंग में
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले ।
[तिफ़्ल = बच्चा][ बहुवचन अत्फ़ाल]
इस शे’र को लोग अपने अपने हिसाब से सुनाते है पढ़ते है कभी - गिरता है शहसवार- पढ़ते हैं तो कभी - गिरते हैं शहसवार-पढ़ते हैं।
यह शे’र मालूम नहीं किसका है। इसके ख़ालिक़[रचयिता] का नाम मालूम नहीं। यह सर्क़ा किया हुआ शे’र है।
ग़ैर असल शे’र हैं। मगर यह शे’र अपने असल शे’र से कहीं ज़ियादा मक़्बूल है लोकप्रिय है ज़ुबानज़द है।
असल शे’र यूँ है -
शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें के बल चले ।
और यह अस्ल शे’र है -मिर्ज़ा अज़ीम बेग ’अज़ीम’ साहब का।
इस अस्ल शे’र के पीछे एक दिलचस्प वाक़या भी है। आप भी सुनें।
अज़ीम बेग साहब, सैय्यद इंशा अल्लाह ख़ाँ "इंशा" के समकालीन [ हमअस्र] थे और इंशा साहब अपने ज़माने के एक मशहूर उस्ताद शायर थे।
एक बार अज़ीम साहब अपना एक कलाम इंशा साहब को दिखाया और सुनाया। इंशा साहब ने उस कलाम को सराहा भी और दाद भी दी। हौसला अफ़ज़ाई के लिए उन्होने अज़ीम से कहा कि अगले मुशायरे में तुम यही ग़ज़ल पढ़ना।
अज़ीम साहब ने मशविरे के मुताबिक़ मुशायरे में बड़े आत्म विश्वास के साथ वही ग़ज़ल पढ़ी। मगर इंशा साहब ने भरी महफ़िल में सरे मुशायरा, इस ग़ज़ल पर तंज़ के तौर पर एक मुख़्म्मस पढ़ा, जिसका एक शे’र यह था--
पढ़ने को सब जो यार ग़ज़ल दर ग़ज़ल चले
बह्र-ए-रजज़ में डाल कर बह्र-ए-रमल चले।
अज़ीम साहब को इंशा साहब का यह व्यवहार, यह विश्वास घात अच्छा नहीं लगा जब् कि वह अपना कलाम इंशा साहब को पहले ही दिखा चुके थे।
हो सकता है अज़ीम साहब से ही कलाम सुनाने में कुछ ग़लती हो गई हो।
ख़ैर अज़ीम साहब ने भी तुर्की ब तुर्की उसी बह्र में उसी वक़्त अपना यह शे’र सुना दिया--
शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें के बल चले ।
कभी कभी ग़ैर अस्ल शे’र -अपने असल शे’र पर भारी पड़ जाता है, ज़ियादा मक़्बूल हो जाता है ज़ियादा लोकप्रिय हो जाता है।
प्रस्तुत कर्ता
-आनन्द पाठक ’आनन’-
880092 7181
[स्रोत " आहंग और अरूज़ "--कमाल अहमद सिद्दिक़ी ]
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