Wednesday, 29 July 2026

चर्चा 003 : मफ़ऊलातु पर--[क्रमांक से आगे]

 चर्चा 003 : सालिम रुक्न मफ़ऊलातु पर--[क्रमांक से आगे]


पिछले चर्चा 002] में एक सालिम रुक्न -मफ़ऊलातु- पर चर्चा किया था जिसमें कहा था कि यह एक सालिम रुक्न होने के बावज़ूद इससे कोई सालिम बह्र नहीं बनती तो फिर इसको बनाया ही क्यों गया?

जी बिलकुल सही। सालिम बह्र में प्रयोग नहीं हो सकता मगर -’मुरक़्क़ब बह्र’-में तो हो सकता है और होता भी है

बह्र-ए-मुक़्तज़िब में । यह रुक्न बह्र-ए-मुक्तज़िब का बुनियादी रुक्न है।

बह्र-ए-मुक़्तज़िब एक मुरक़्कब बहर है और यह दो सालिम बह्रों से मिलकर बनता है

 2221  + 2212 यानी

मफ़ऊलातु + मुसतफ़इलुन

इत्तिफ़ाक़न यह बह्र-ए-मुन्सरिअ’ बह्र का बरअक्स [ mirror image] बह्र है। ख़ैर

अब इस बह्र पर वो तमाम जायज़ ज़िहाफ़ लग सकते है जो 2221--और 2212 पर अलग अलग लग सकते है। 

यहाँ उन पर चर्चा नहीं करूँगा और न ही इससे बरामद होने वाली अन्य मुज़ाहिफ़ बह्रों की चर्चा करूँगा। वह किसी भी अरूज़ की किताब में मिल जाएगी।

मगर इससे बरामद एक मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा ज़रूर करना चाहूँगा  जो बहुत ही लोकप्रिय है ,मुतर्न्निम है, मानूस है और बहुत से कदीम-ओ- ज़दीद शो;अरा

ने इस मुतर्न्निम बह्र में ग़ज़ल कहीं है। 

वो बह्र है

121--22 / 121-22// 121-22/ 121-22 यानी

फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन/फ़ऊलु-फ़ेलुन यानी

बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’ मख़्बून मरफ़ूअ’मुसक्किन मुज़ाइफ़

यह एक 16-रुक्नी बहर है। ध्यान रहे आठ रुक के बाद जो -//- निशान है वो बह्र-ए-शिकस्ता की अलामत नहीं

बल्कि लाज़िमन अरूज़ी वक़फ़ा की अलामत है।

यह बह्र कैसी बनती है --इस पर चर्चा नहीं करूँगा

और साथ ही यह बह्र विवादास्पद भी है

कुछ लोग इसे -मुतक़ारिब - के तहत रखते है और कुछ लोग इसे -मुक्तज़िब- के। सबके अपनी अपनी

दलीले है। जहाँ तक मेरा सवाल है मैं इसे --मुक्तज़िब- के तहत ही रखता हूँ।

इस बह्र में दो ग़ज़लों के चन्द अश’आर पेश कर रहा हूँ आप भी गुनगुनाएँ--और लुत्फ़अंदोज़ हों

शकील बदायूनी साह्ब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर [पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी\


लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले

मुहब्बत आइना हो चुकी थी वज़ूदे-बज़्मे-जहाँ से पहले


समझ रहा था कि नाउमीदी, न पर्दादारे-उमीद होगी

नज़र उठा कर जो मैने देखा गुबार था कारवाँ से पहले ।


क़सम फ़रेबे-निगाह-ओ-दिल की, हमें तेरी जुस्तजू ने खोया

वहीं थी दरअस्ल अपनी मंज़िल क़दम उठे थे जहाँ से पहले


अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ किस्मत में जौर-ए-पैहम

खुली जो आँखें इस अंजुमन में नज़र मिली आसमां से पहले।


-शकील बदायूनी--

इसकी तक़्तीअ’ कर के आप  एक बार चेक कर लें कि यह ग़ज़ल इस बह्र मैं है भी कि नहीं?]

आप तलाश करेंगे तो इसी बह्र में और भी शायरों के कलाम मिल जाएँगे\


अब  अब्दुल हमीद ’अदम’ साहब की ग़ज़ल के चन्द अश’आर  इसी बह्र में मुलाहिज़ा फ़रमाएँ--

[पूरी ग़ज़ल यू-ट्यूब या इन्टर्नेट पर मिल जाएगी]


जुनूँ का जो भी मुआमला है वो शुस्ता-ओ-ख़ुशनिज़ाम होगा

बिला तकल्लुफ़ जो चल पड़ेगा, वो राहरौ तेज़गाम  होगा ।


जो हर ख़ताकार राहजन को दुआएँ दे कर चला गया है 

वो शख़्स मेरा ख़याल ये है,  बहुत ही आली-मुकाम होगा


हमे ग़रज़ क्या कि बज़्मे-महशर को हाऊ-हू-में शरीक़ होते

वहाँ गए हैं जो छुप छुपा कर, उन्हें वहाँ कोई काम होगा ।


चलो ये मंज़र भी देख ही लें ’अदम’ तकल्लुफ़ की गुफ़्तगू का

सुना है”मूसा’ से ’तूर’ पर आज फिर कोई हमकलाम होगा ।


-अब्दुल हमीद ’अदम’


इन ग़ज़लों को आप मन ही मन गुनगुनाइए --आनन्द उठाइए


-आनन्द.पाठक ’आनन’

880092 7181


Tuesday, 28 July 2026

चर्चा 002 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

 चर्चा 002 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

 जो शायरी में अरूज़, वज़न बहर अर्कान से वाक़िफ़ होंगे, वह इस रुक्न से अवश्य परिचित होंगे।

जी हाँ यह सालिम एक रुक्न  का नाम है मगर अफ़सोस की इस सालिम रुक्न से 

कोई सालिम बह्र नहीं बनती। क्यों नहीं बनती? इसकी चर्चा आगे करेंगे।

मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु -प्रथम दृष्टया देखने में एक जैसे लगते है या एक ही लगते हैं। बहुत से हमारे मित्र

अपनी ग़ज़ल की बह्र का नाम लिखते समय एक ही समझ कर प्रयोग करते हैं और लिखते है,लेकिन

जो समझदार  हैं वो इस झंझट में नही पड़ते और बस अर्कान को ’Mathematical Form' में लिख कर आगे बढ़ जाते हैं अब आप समझते रहें कि मफ़ऊलात् है कि -मफ़ऊलातु ।

 इत्तिफ़ाक़न दोनो का Mathematical Form एक ही है यानी  -2221-

जब कि हक़ीक़तन यह एक नहीं है। अरूज़ की ज़ुबान में ये दो अलग अलग रुक्न की हैसियत रखते है।

मफ़ऊलातु - की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? मफ़ऊलात को ही सालिम रुक्न लिखने में क्या समस्या थी?

आज हम इसी पर चर्चा करेंगे।

आप निम्नलिखित अर्कान को तो जानते पहचानते होंगे?

मफ़ाईलुन् = 1 2 2 2  = बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम रुक्न

फ़ाइलातुन् = 2 1 2 2  = बह्र-ए-रमल का बुनियादी सालिम रुक्न

मुसतफ़इलुन् =2 2 1 2  = बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी सालिम रुक्न

अगर आप ध्यान से देखें तो-1- का लोकेशन क्रमश: एक स्टेप दाएँ खिसकता जा रहा है।

 तो फिरवह वहीं क्यों रुक गया? जब कि  उसे एक स्टेप और दाएँ खिसकने का हक़ भी है और गुंजाइश भी है।

जी हाँ बिलकुल सही। तो लीजिए एक स्टेप दाएँ और खिसका देते हैं।

यानी  2 2 2 1 कर देते है। जी हाँ यह भी एक सालिम रुक्न है और इसी का नाम -मफ़ऊलातु- है।

मफ़ऊलातु क्यों? मफ़ऊलात क्यों नहीं ?

 आप ऊपर के अर्कान में जो -1- देख रहे है वास्तव में वह मुतहर्रिक हर्फ़ का लोकेशन है।

चाहे मफ़ा में मीम हो, फ़ाइला में -ऐन- हो ,इलुन में -ऐन- हो, इस लोकेशन पर सब मुतहर्रिक की हैसियत में है 

और हर रुक के आख़िर में -न- [ नून ] है वो सब साकिन [ स्वर रहित] की हैसियत में क़ाबिज़ हैं

मैने  साकिन हर्फ़ को हलन्त  लगा कर् दिखा दिया है।

 अगर हम मफ़ऊलात् [ मफ़ऊलात ] लिखते तो यह भ्रम् हो जाता कि आख़िरी हर्फ़् साकिन्

है जब् कि 2221 में वस्तुत्: आख़िरी हर्फ़ मुतहर्रिक [1] है। इसी बात को differentiate करने के लिए [-ते पर पेश =तु]- लगा देते हैं  कि कहीं कोई भ्रम न रहे कि इस सालिम रुक  का आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक - है [ न कि सालिम] और यही ख़ासियत इसे अपने समूह के अन्य सालिम रुक्न से इसे अलग खड़ा करती है

जितने भी सालिम रुक्न है--चाहे--फ़ऊलुन--फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन --फ़ाइलातुन--मुसतफ़इलुन- मुतफ़ाइलुन-मुफ़ाइलतुन सबके आखिर में न- [नून] है जो साकिन है।

मगर मफ़ऊलातु में --आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक है और किसी को कोई  confusion न रहे इसलिए -ते के ऊपर पेश-लगा कर जता दिया।

अब तो स्पष्ट हो गया होगा कि-- मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु-- same नहीं है देखने में भले एक लगता हो वज़न भले ही दोनो एक जैसी  2221 हैसियत रखते हों।

ऊपर मैने कहा था कि -मफ़ऊलातु - एक सालिम रुक्न् ज़रूर है मगर इससे सालिम बहर नही बनती।

यानी 2221---2221---2221---2221 में कोई ग़ज़ल नहीं कही जा सकती?

क्यों नहीं कही जा सकती?

कारण है।

 उर्दू ज़बान की हैयत [बनावट] ही ऐसी है कि इसका हर लफ़्ज़ मुतहर्रिक से शुरु होता है और साकिन पर गिरता है

और मिसरा के आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ नहीं आ सकता । आप ऊपर देखे--जितने भी सालिम अर्कान अरूज़ में डिजाइन किए गए सब के आखिर में हर्फ़-ए-साकिन  [स्वर रहित हर्फ़] है [ सिवा मफ़ऊलातु को छोड़ कर} अत: मिसरा के आख़िर में -मफ़ऊलातु- कैसे ला दे- मुतहर्रिक हर्फ़ कैसे ला दें।

एक बात और  उर्दू ज़बान में आप को कोई ऐसा लफ़्ज़ भी न मिलेगा जिसके आख़िर मे--मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो।

तो सवाल यह कि --कि फिर -मफ़ऊलातु- रुक्न बनाने की ज़रूरत क्या थी?

अरे भाई मिसरा के आखिर में नहीं आ सकता तो कोई बात नहीं--मिसरा के बीच में --शुरुआत में तो आ सकता है और आता भी है जैसे बह्र-ए-मुक्तज़िब में --। इसी लिए इसे बह्र-ए-मुक्तजिब का बुनियादी रुक्न भी कहते है

अगर मिसरा के आख़िर में आयेगा भी तो अपनी मुज़ाहिफ़ शकल [ ज़िहाफ़ शुदा शकल] में ही आएगा जो -आख़िरी हर्फ़ -तु-[ मुतहर्रिक] को साकिन कर देता हो।


-आनन्द.पाठक ;आनन’-

880092 7181


शायरी 008

 शायरी 008



शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें  के बल चले ।

-मिर्ज़ा अज़ीम बेग अज़ीम-

[ मिस्ल-ए-बर्क़= बिजली की तरह]

[तिफ़्ल = बच्चा]

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अब हवाएँ ही करेंगी रोशनी का फ़ैसला

जिस दिए में जान होगी, वो दिया रह जाएगा।

- महशर बदायूनी-

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ऐसे ही और मशहूर और मकबूल शे’र यहाँ सुनें--


शायरी 007:

 शायरी 007


जो निक़ाबे-रुख़ उठा दी तो ये क़ैद भी लगा दी

उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे ।

-शकील बदायूनी-

[बाम तक = छत तक]

===

निकल कर दैरो-काबा’ से अगर मिलता न मयख़ाना

तो ठुकराए हुए इंसाँ खुदा जाने कहाँ जाते ।

-क़तील शिफ़ाई-


ऐसे ही और चन्द मशहूर और मक़्बूल अश’आर यहाँ सुनें


प्रस्तुतकर्ता
आनन्द.पाठक’आनन’-

880092 7181

Tuesday, 21 July 2026

क़िस्सा 004: मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’ --कुछ दिलचस्प बातें

 क़िस्सा 004:  मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’ --कुछ दिलचस्प बातें

मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’[ 1714-1781]    एक उस्ताद शायर थे। आप मीर तक़ी मीर के समकालीन थे।और दिल्ली में पैदा हुए थे। उर्दू अदब और शायरी में कसीदा तंज और हिजो लिखने / कहने के एक अच्छे शायर माने जाते हैंहाँलांकि सौदा ने मसनवी, क़सीदे, मर्सिया तर्जीहबन्द, मुख़म्मस, रुबाई, क़ता और हिजो भी लिखा है।बाद में वह अवध के नवाब के साथ फ़ैज़ाबाद आ गए थे ।

सौदा साहब बड़े गुस्सैल थे । किसी से नाराज़ हुए नहीं कि तुरन्त ’हिजो’ कहने लगते थे। मुहम्मद हुसेन आज़ाद साहब ने अपनी तारीखी किताब ’आब-ए-हयात’ में इसका ज़िक्र किया है। वह लिखते हैं कि गुंचा नाम का उनका एक नौकर था।हर समय ख़िदमत में लगा रहता था और साथ में’कलमदान भी लिए चलता था। सौदा साहब जब किसी पर बिगड़ते थे तोगुंचा को पुकारते --अरे गुंचा ! ज़रा ला तो कलमदान मैं इसकी ख़बर तो लूँ। इसने मुझे समझ क्या रख्खा है। फिर सौदा साहब वो हिजो लिखते सुनाते कि शर्म-0-हया भी शरमा जाए। सुनने वाला कान पर हाथ रख लें।फिर हिजो की तो कोई हद ही न होती थी। आलिम जाहिल फ़कीर, अमीर,नेक बद उस समय किसी की दाढ़ी उनके हाथ से न बचती।

एक बार  ’फ़िदवी’ साहब [इन्ही के  एक समकालीन शायर] किसी ऐसे ही मौके पर ’सौदा’ की शान में नहले पे दहला, तुर्की ब तुर्की --यह हिजो कही-यह सुनाया-

कुछ कट गई है पेटी कुछ कट गया है डोरा

दुम दाब सामने से वह उड़ गया लुटेरा

भडुआ है, मसख़रा है, सौदा उसे हुआ है।

[ अब यह न पूछिएगा कि ’हिजो’ क्या होता है]

अगर आप यह सोच रहे हैं कि इसके बाद सौदा साहब ने हिजोगोई से तौबा कर ली?

नहीं, कत्तई नहीं।

---  ---

एक बार क़यामुद्दीन साहब [ तख़ल्लुस ’उम्मीदवार ] सौदा के समकालीन] सौदा के पास शागिर्द होने आए।

तख़ल्लुस सुना तो सौदा साहब मुस्कराए और ये हिजो कही--

है फ़ैज़ से किसी के शजर उनका बारदार

इस वास्ते किया है तखल्लुस ’उम्मीदवार’।

जब औरत गर्भ से होती है तो दिल्ली की ज़बान में उसे ’उम्मीदवार’ कहते है।

फिर तो कयामुद्दीन साहब ने अपना तखल्लुस ही बदल लिया।

सौदा तो सौदा। कहाँ बाज़ आने वाले।

आदतन , एक बार एक पठान की शान में एक हिजो कही। फिर क्या था।

पठान तो पठान । सौदा की कमर पकड़ हज़ारों गालियां दीं और उन्हे वहीं पटक कर सौदा के सीने पर चढ़ बैठा।

शायद सौदा को उस दिन मालूम हुआ होगा कि हिजो कहने में क्या मजा है, क्या सज़ा है। 

खैर

यह सौदा साहब के व्यक्तित्व का एक पहलू है। वरना सौदा साहब एक बेहतरीन , ज़हीन और उस्ताद शायर थे।

गम्भीर और संजीदा शायरी भी करते थे। उनका यह शे’र बहुत मशहूर है---

का’बा अगरचे टूटा तो क्या जा-ए-ग़म है शेख़!

कुछ कस्र-ए-दिल नहीं कि बनाया न जाएगा ।

यानी का’बा तो चलो एक बार टूटा तो बनाया भी जा सकता है मगर दिल अगर एक बार टूट गया तो फिर

’बनाया न जाएगा’

प्रस्तुतकर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’

8800927181

[स्रोत : आब-ए-हयात-[मुहम्मद हुसेन आज़ाद

औरशे’र-0-सुख़न [ अयोध्या प्रसाद गोयलीय 

से साभार]

21-07-26


Monday, 20 July 2026

क़िस्सा 003 : मीर अनीस ---कुछ दिलचस्प बातें--

क़िस्सा 003 :  मीर  अनीस ---कुछ दिलचस्प बातें--

 मीर बाबर अली अनीस ’अनीस’ का जन्म फ़ैज़ाबाद [उ0प्र0][ में हुआ था। वह अपने ज़माने के एक मशहूर मर्सियानिगार और मर्सियागो शायर थे। मरसिया उर्दू शायरी की एक अदबी विधा है जिसमे जिसमे कर्बला की लड़ाई का, हसन-हुसेन साहब  की शान का, शहादत की दास्तान लिखी व सुनाई जाती है। अनीस साहब को इसमे महारत हासिल थी और कर्बला की दास्तान को सजीव ऐसे सुनाते थे मानो वह खुद उस जंग में शामिल थे। उन्होने मर्सिया निगारी को उच्च स्तर पर पहुँचा दिया। अनीस साहब के खानदान में लगभग सभी शे’र-0-सुख़न से बावस्ता थे।

मीर ’अनीस’ साहब  ने एक बार किसी मर्सियाख़्वानी की महफ़िल में यह मिस्रा पढ़ा-

’बह्रे अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’

इस पर श्रोताओं ने शोर मचाया कि "बह्र-ए-अली" में ’ज़म’(खोट ,दोष) का पहलू निकलता है.क्योंकि "बह्र-ए-अली" तो "बहरे अली’(यानी कान से माज़ूर अली) पढ़ा या सुना जा सकता है और ज़ाहिर है कि यह बे-अदबी है.’अनीस’ ने फ़ौरन मिस्रा बदल दिया

"काने अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’

लोगों ने फ़िर शोर मचाया कि हज़रत अली "काने’(एक आँख वाले) भी  नहीं थे । .घबरा कर मीर ’अनीस’ ने एक बार फिर मिस्रा बदल दिया

"गंजे अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’

[गंज़= खजाना]

लोग फिर चीख उठे कि हज़रत अली "गंजे" भी नहीं थे.मीर ’अनीस’ साहब  ने एक बार फिर फ़ौरन मिस्रा बदल दिया

"कंजे़ अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’    

                                     (कंज़= खज़ाना)

और फिर इस तरह उनकी जान छूटी।

 इन मिसालों से यह न समझा जाए कि हमेशा दूसरे ही "अनीस"  साहब की अश’आर मुकम्मल किया करते थे .मीर ’मुनीस’ (अनीस के छोटे भाई)ने एक दिन "अनीस’को अपना शे’र सुनाया.

न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है

यूँ ही मर जाऊ ये मर्ज़ी मिरे सैयाद की है

मीर ’अनीस’ ने दूसरे मिस्रे में मामूली तरमीम (बदलाव) कर के शे’र को वो चार चाँद लगाया दिए जिस से यह शे’र ज़र्ब-ए-उल-मिसाल (लोक-मुहावरों) का दर्जा इख़्तियार कर गया

न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है

घुट कर मर जाऊ ये मर्ज़ी मिरे सैयाद की है

उस्ताद लोगों के इस्लाह भी क्या खूब होते है, काबिल-ए-तारीफ़ होते हैं।


प्रस्तुतकर्ता

आनन्द पाठक ’आनन’

8800927181

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ऐसे ही अदबी दिलचस्प किस्से मेरे ब्लाग --शे’र-0-सुख़न की बातें -पर पढ़ सकते है--

https://akp317.blogspot.com

स्रोत : इन्टर्नेट से साभार

मेरी टिप्पणी- रेख़्ता साइट पर इस शे’र के ख़ालिक [ रचयिता] का नाम --शाद लखनवी दिया गया है। इस पर और तहक़ीक़ात की ज़रूरत है। अगर कोई मित्र/पाठकगण इसका पुख्ता प्रमाण / मुस्तनद नज़ीर दे सकें तो कॄपा होगी जिससे इस लेख को और सही बनाया सा सके।

Sunday, 19 July 2026

शायरी 006

क़िस्त 010: शायरी 006 


जो इक्तिदार की कुर्सी पे जल्वा फ़रमा हैं

न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है ।

-सुरेश चन्द्र ’शौक़’

[इक्तिदार = हुकूमत]


सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा

देवताओं से शुरु की, वहशियों तक आ गए ।

-चन्द्रसेन विराट-

ऐसे ही लोकप्रिय मक़्बूल  अश’आर  जो हर आम-0-ख़ास के ज़ुबानजद  है 
यहाँ सुनें--


शायरी 005

क़िस्त 009 : शायरी 005

 

जिसके आँगन में अमीरी का शजर लगता है

उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

-अंजुम रहबर-


 मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे

कि दाना ख़ाक में मिल कर गुले-गुलज़ार होता है ।

-इक़बाल-

ऐसे ही शे’र जो हर आम-ओ-ख़ास के ज़ुबान पर

रहते हैं मौक़े दर मौक़े बोले व पढ़े जाते हैं ,लोकप्रिय

मक़्बूल है-

-यहाँ सुनें




 

Friday, 17 July 2026

शायरी 004

क़िस्त 008: शायरी 004


कुछ नही बोला तो मर जाएगा अंदर से ’शुज़ा’

और कुछ बोला तो फिर बाहर से मारा जाएगा।

-शुज़ा’ ख़ावर-


जो है ज़ुबाँ  पे दिल को नहीं उससे फ़ायदा

जो दिल में है वो ला नहीं सकते ज़ुबान पर ।

-अकबर इलाहाबादी -

ऐसे बहुत से अश’आर है जो हर आम-ओ-ख़ास के ज़ुबान पर रहते है और

मौके महल सुनाते रहते है।
ऐसे ही अन्य अश’आर यहाँ सुनें और आनन्द उठाएँ--



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प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द.पाठक ’आनन’

 

शायरी 003

 क़िस्त 007 : शायरी 003

ऐसे बरमहल [ मौक़े मुताबिक़] अश’आर आप ने  बातचीत के दौरान ज़रूर  सुने होंगे
लोग अपने अपने हाफ़िज़ा के मुताबिकं  [ याददास्त के अनुसार ] सुनाते रहते है।


ज़िंदगी ज़िंदादिली  का नाम है -

मुर्दा दिल ख़ाक जिया करते हैं !

-इमाम बख़्श नासिख़-


तू इधर उधर की न बात कर, यह बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा ,

हमे रहजनों से गिला नहीं , तेरी रहबरी  का सवाल  है ।

-शहाब जाफ़री -

ऐसे ही अन्य अश’आर आप यहाँ सुनें--

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-आनन्द पाठक ’आनन’-

क़िस्सा 001 का परिशिष्टांक

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किस्सा 001 का परिशिष्ट ं अंक---

मित्रों किस्सा 001 में मिर्जा इंशा अल्लाह ख़ाँ ’इंशा’ और मिर्ज़ा अज़ीम बेग ’अज़ीम’ साहब का एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाया था जो इसी ब्लाग पर उपल्ब्ध है।
https://akp317.blogspot.com/2026/07/001.html

क़िस्सा को मुख़्तसर [संक्षेप] करने के लिए बहुत सी संबद्ध बातें वहाँ नहीं लिखी।

मेरे एक मित्र विवेक नारायण जी ने वह अतिरिक्त बातें मुझसे साझा की। वह सब बाते आप लोगों की जानकारी व सुविधा के लिए यहाँ लगा रहा हूँ ताकि सनद रहे।

क़िस्सा 001 में इंशा के जिस मुखम्मस का जिक्र हुआ है और जिसे इंशा ने उस मुशायरे में तंजन पढ़ा था ,वह यूँ था--


र तू मुशाइरे में सबा आज-कल चले

कहियो "अज़ीम" से कि ज़रा वो संभल चले

इतना भी हद से अपनी न बाहर निकल चले

पढ़ने को शब जो यार ग़ज़ल दर ग़ज़ल चले

बह्र-ए-रजज़ में डाल कर बह्र-ए-रमल चले


- मिर्ज़ा इंशा अल्लाह खान "इंशा"

---  ----


और इसके जवाब में अज़ीम साहब ने  इसी ज़मीन पर जो मुखम्मस पढ़ा था ,वह यह था--

1.

वो फ़ाज़िल-ए-ज़माना हो तुम साहिब-ए-उलूम

तैहसील-ए-सर्फ़-ओ-नह्व से जिन की मची है धूम

रमल-ओ-रियाज़ी, हिकमत-ओ-है'अत, जफ़र, नुजूम

मंतिक, बयाँ, मआनी कहें सब ज़मीं को चूम

तेरी ज़बाँ के आगे न दहकां का हल चले


2.

इक दो ग़ज़ल के कहने से बन बैठे ऐसे ताक़

दीवान शा'इरों की नज़र से रहे ब-ताक़

नासिर अली नज़ीरी की ताक़त हुई है ताक़

हर चंद अभी ना आई है फ़हमीद-ए-जुफ़्त-ओ-ताक़

टंगड़ी तले से उर्फ़ी ओ क़ुदसी निकल चले


3.

था रोज़ फ़िक्र में के कहूँ म'अनी ओ मिसाल

तजनीस ओ हम-रिआयत ए लफ़ज़ी व हम-ख़याल

फ़र्क़-ए-रजज़ रमल न लिया मैंने गो संभाल

नादानी का मिरे न हो दाना को एहतिमाल

गो तुम ब-क़द्र-ए-फ़िक्र यही कर हमल चले


4.

नज़दीक अपने आप को कितना ही समझो दूर

पर खूब जानते हैं मुझे जो हैं ज़ी-शुऊर

वो बहर कौन सी है नहीं जिस पे याँ उबूर

कब मेरी शाइरी में पड़े शुबह से क़ुसूर

बन कर क़ुमल निकालने को तुम ख़लल चले


5.

मौज़ूनी-ओ-मआनी में पाया न तुमने फ़र्क़

तबदील-ए-बह् र से हुए बह्र-ए-ख़ुशी में ग़र्क़

रौशन है मिस्ल-ए-मिह्र ये अज़ ग़र्ब ता ब शर्क़

शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वोह तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले ।


6.

कम-ज़र्फ़ी से तुम्हें तो यही आई है उमंग

कीजे नुमूद-ए-ख़ल्क़ में अब कर सुख़न की जंग

अपने तईं तो बहसने में आता है यार-ए-नंग

इतना भी रखिये हौसला फव्वारा सा ना तंग

चुल्लू ही भर जो पानी में गज़ भर उछल चले


7.

क्यूँ जंग-ए-गुफ्तगू को तुम उठ दौड़े इस क़िमाश

करते जो भारी पाइंचा होता नाः परदाः फ़ाश

पर समझें कब ये बात जो कुंदे हों ना-तराश

तेग़-ए-ज़बाँ को म्यान में रखते तुम अपने काश

नाहक़ जो तुम अज़ार से बाहर निकल चले


-अज़ीम बेग ’अज़ीम- 

--====== ===


शब्दार्थ __

1.

फ़ाज़िल = जिस ने सारी विद्या पढ़ ली हो, फ़ारिगुत्तहसील

उलूम = इल्म का बहुवचन, विद्याएं, बहुत सा ज्ञान

तह् सील = हासिल करना, उपार्जन, एकत्र करना

सर्फ़ = व्याकरण की एक शाखा, पद-व्याख्या

नह्व = व्याकरण की वह शाखा जिसमें वाक्यों के परस्पर सम्बन्ध और शब्दों की स्थिति जानी जाती है

सर्फ़ ओ नह्व = व्याकरण, क़वाइद, पद-व्याख्या

रमल = भविष्य में होने वाली घटनाओं को जानने की विद्या, इसका मूल आधार बिंदी और शून्य होते हैं

रियाज़ी = गणित, इल्मुल-हिसाब,

हिकमत = विज्ञान, science, आयुर्वेद, तिब(ब्ब)

है'अत = खगोल शास्त्र

नुजूम = ज्योतिष शास्त्र

मंतिक़ = तर्क शास्त्र, logic

बयाँ = साहित्य, अलंकार

मआनी = मा'ना का बहुवचन, अर्थ-समूह

देहक़ान/देहक़ाँ = किसान

2.

ताक़ (1st line) = दक्ष, निपुण, चतुर

ताक़ (2nd line) = दीवार में बना हुआ छोटा मेहराबदार ख़ोल, आला, मोखला/मोखल

ब-ताक़ = ताक़ में रखा हुआ

ताक़ (3rd line) = समाप्त होना (इस अर्थ में सिर्फ 'ताक़त' शब्द के साथ इस्तेमाल होता है), शक्ति-समाप्त

फ़ह् मीद/फ़हमीद = समझ, बुद्धि, विवेक

जुफ़्त = जोड़ा, pair, सम संख्या, even number, जैसे 2, 4, 6, 8

ताक़ (4th line) = विषम संख्या, odd number, जैसे 3, 5, 7, 9

दिलचस्प बात ये है कि 'ताक़' शब्द के ये सभी मानी लुग़त/ शब्दकोश में मौजूद हैं

नासिर अली नज़ीरी, उर्फ़ी और क़ुदसी फ़ार्सी के बड़े शायरों के नाम हैं

3.

म'अनी = अर्थ-गर्भित

मिसाल = आदर्श, नमूने का

तजनीस = एकरूपता, हमशक्ली,; एक शब्दालंकार जिसमें किसी शेर में एक जैसे शब्द लाये जाते हैं, यमक

रिआयत = व्यवहार में कोमलता; मूल्य में कमी; विचार, ध्यान, ख़याल

हम-रिआयत = रिआयत के साथ

रजज़ = (युद्धक्षेत्र में अपने कुल की शूरता और श्रेष्ठता का वर्णन) यहां बह्रे-रजज़ से आशय है

दाना = बुद्धिमान, कुशल

एहतिमाल = शंका करना, संदेह

हमल/हम्ल = बोझ उठाना, भार (गर्भ और पेट भी इस शब्द के अर्थ है

4.

दूर = अंतर पर, फ़ासिले पर, पृथक, अलग, जुदा

ज़ी = एक उपसर्ग जो संज्ञा के पहले आकर "वाला" का अर्थ देता है, जैसे :- ज़ीअक़्ल = अक़्ल वाला

शुऊर = शिष्टता, सलीक़ा

बहर/ बह्र = शेर का वज़न/वज़् न

उबूर = नदी आदि को पार करना, पार उतरना

क़ुमल = जूं, lice

ख़लल = दरार, crack, विघ्न, बाधा, अड़चन

5.

मौज़ूँ = उचित, मुनासिब; योग्य,लायक़; यथोचित, वाजिब, संतुलित, वह शेर जिसका वज़्न ठीक हो

मौज़ूनी = मौज़ूनियत = मौज़ूँ होने का भाव, औचित्य, मुनासबत, योग्यता, क़ाबिलीयत

मिह्र = सूरज, सूर्य

मिस्ल ए मिह्र = सूरज के समान

अज़ = से

ग़र्ब = पश्चिम

शर्क़ = पूरब

अज़ ग़र्ब ता ब शर्क़ = पश्चिम से पूरब तक

6.

कमज़र्फ़ी = ओछापन; अनुदारता

नुमूद = आविर्भाव, ज़ुहूर; धूम-धाम, तड़क-भड़क; ख्याति, शोहरत; उगना, प्राकट्य, अस्तित्व, हस्ती, प्रकाशित

ख़ल्क़ = जनता, अवाम,

नंग = लज्जा, शर्म; दोष, आर


[सौजन्य से --आ0 विवेक नारायण जी]

प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

दिनांक 17-07-26

Thursday, 16 July 2026

शायरी 002

क़िस्त 005: शायरी 002

:1: 

बग़ैर पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है ,

नहीं भी हो, तो भी मुजरिम दिखाई देता है।

-सुरेश चन्द्र ’शौक़’-

:2: 

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था ,

हमी सो गए दास्तां  कहते कहते ।

-साकिब लखनवी -

:3: 

भाँप ही लेंगे, इशारा सरे महफ़िल जो किया

ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं ।

-माधव राम ”जौहर’

:4:

दीवार-ए-चमन पर ज़ाग़-ओ-ज़गन

मसरूफ़ हैं नौहाख़्वानी में ’

हर शाख में उल्लू बैठा है

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा ।

[ ज़ाग-ओ-ज़गन = चील कौआ]

[ नौहाख़्वानी में = रोने धोने में ]

-क़माल सालारपूरी-

:5:

गए दोनों ज़हान के काम से हम,न इधर के रहे,न उधर के रहे ।

न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनमनन इधर के रहे ,न उधर के रहे ।

-मिर्ज़ा सादिक़ ’शरर’

:6:

रात की बात का मज़्कूर ही क्या ,

छोड़िए रात गई, बात गई ।

-चिराग़ हसन ’हसरत’

:7:

सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ

ज़िंदगी गर कुछ रही तो, ये जवानी फिर कहाँ ।

-ख़्वाज़ा मीर ’दर्द’-

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-आनन्द पाठक ’आनन’
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आवाज़ का सफ़र

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शायरी 001

शायरी 001

 :1:

मैं चुप रहा तो मुझे मार देगा मेरा जमीर

गवाही दी तो अदालत में मारा जाऊँगा ।

-राणा सईद दोशी-

:2:

मैं मयकदे की राह से होकर निकल गया

वरना सफ़र हयात का काफी तवील था ।

अब्दुल हमीद ’अदम’

:3:

ये आईना है सदाक़त बयान करता है

कि इसके आगे अदाकारियाँ नहीं चलती

--मंज़र भोपाली-

:4: 

अजीब बात है वो एक-सी ख़ताओं पर

किसी को क़ैद किसी को रिहाई देता है ।

-मंज़ूर हाशमी--

;5:

जफ़ा के ज़िक्र पर तुम क्यों सँभल के बैठ गए

तुम्हारी बात नहीं, बात है ज़माने की ।

-मजरूह सुल्तानपुरी-

:6:

गो, ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गए

लेकिन इतना तो हुआ, कूछ लोग पहचाने गए।

-ख़ातिर ग़ज़नवी-

;7:

ऎ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है ,

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता  है ।

-मिर्ज़ा रज़ा बर्क़- 

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Wednesday, 15 July 2026

चर्चा 001: मुन्तज़िर--मुन्तज़र

 एक चर्चा 001 : मुन्तज़िर--मुन्तज़र
मुन्तज़िर और मुन्तज़र दोनों उर्दू के लफ़्ज़ है और दोनो में ही "इन्तज़ार" का भाव छुपा हुआ है ।
मुन्तज़िर = किसी का इन्तज़ार करने वाला , प्रतीक्षा करने वाला, प्रतीक्षक
मुन्तज़र  = जिसका इन्तज़ार किया जाए ,जिसकी राह देखी जाए, जिसकी प्रतॊक्षा की जाए 
हाँ तो? इसमें कौन सी नई बात है?यह तो सब जानते है।
 बिलकुल जानते होंगे।
अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल है। आप सबने पढ़ा सुना होगा।
  कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़िर, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
  कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मिरी जबीने-नियाज़  में । 
-इक़बाल-
यह ग़ज़ल बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यानी
11212---11212----11212---11212 का ।
 यह ग़ज़ल इतनी मानूस है कि तमाम ग़ज़ल के  मज़्मूआ में पाया जाता है और बहुत से गायकों ने इसे गाया है।
हाँ तो?
मगर कई जगह --मिसर उला में---मुंतज़िर--छपा हुआ मिलेगा--तो कहीं -मुंतज़र--छपा मिलेगा।
और गायकों ने भी कहीं इसे - मुंतज़िर-गाया है और कहीं-- मुंतज़र- गाया है।
तो सही क्या है फिर? रेख़्ता में सही दिया गया है।
सही मिसरा है--
 कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
यानी आप की प्रतॊक्षा है--
 तो ऐसा क्यों हो जाता है? ख़ल्त मल्त क्यों हों जाता है फिर?
दोनॊ शब्द इतने आस पास है कि खल्त मल्त का इमकान बना रहता है
दूसरी बात यह कि दोनो ही शब्दो का वज़्न एक सा ही है- 212 -
मुन्तज़िर = मुन त ज़िर = 2 1 2
मुन्तज़र = मुन त  ज़र =2 1 2
अगर आप गाएंगे तो ग़लती पकड़ में न आएगी --गाने में खटका न लगेगा--कारण कि दोनो केस मे
लय समान गति -प्रवाह में रहेगी। 
मगर भाव??
-आनन्द.पाठक ’आनन’-

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क़िस्सा 002: अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी--

 किस्सा 002: अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी--

यह मिसरा बातचीत के क्रम में [दौरान-ए-गुफ़्तगू] कभी न कभी आप ने ज़रूर सुना होगा जब कोई आदमी बहुत 

दूर की सोचता है, अपनी क्षमता से ज़ियादा सोचता है जब कि सामने वाले आदमी को उससे यह उमीद नहीं होती।

अमूमन यह मिसरा बतौर तंज़ पढ़ा जाता है ।

 असल में यह एक शे’र का मिसरा सानी है और पूरा शे’र यूँ है --ज

उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दैजूर की सूझी

अंधे को अँधेरे में बड़ी  दूर की  सूझी।

[ शब-ए-दैजूर = अमावस्या की रात की कालिमा ]ो

 कुछ लोग मिसरा सानी को --बहुत दूर की सूझी-- कह कर पढ़ते है जब कि कुछ लोग --बड़ी दूर की सूझी --कह कर सुनाते है।

ऐसा इसलिए हो जाता कि ऐसे बरमहल [ मौक़े के मुताबिक़]   मशहूर शे’र  सुनते- सुनाते इतने घिस जाते हैं कि सुनाने वाले को  असल शे’र के रूप का पता ही नहीं रहता।

और वैसे भी -बड़ी-[12] और बहुत [12] समान वज़न होने के कारण ब आसानी शे’र में ऐसे ख़्ल्त मल्त [ घुल मिल ] जाते है कि पता ही नही चलता।

वैसे ही कहीं कहीं आप को शब-ए-दीजूर-  छपा लिखा मिल जाएगा जब कि कहीं कहीं दैजूर छपा मिलेगा।

 सही शब्द ’दैजूर’ ही है}

ख़ैर  इस शे’र का एक दिलचस्प वाक़या है--

दर अस्ल यह शे’र दो मुख़्तलिफ़ शायरों के अलग अलग कहे गए मिसरों से बना है।

पहला मिसरा [ मिसरा ऊला ] अपने ज़माने के मशहूर शायर शेख़ कलन्दर बख़्श ’जुरअत’ का है जब कि दूसरा मिसरा इन्शा अल्लाह खाँ ’इंशा’ का है । इंशा अपने ज़माने के मशहूर शायर थे और जुरअत के दोस्त भी थे।

इंशा साहब बिला शक एक जहीन और अच्छे शायर थे, मगर एक दरबारी शायर थे। इस कारण उनके व्यक्तित्व में 

कुछ कमियाँ भी थी जैसे अपने आका की ख़ुशामदी, चापलूसी, दरबाए के अन्य शायरों को नीचा दिखाना,हिजोबाजी करना, तंज़ कसना बग़ैरह।

ख़ैर। इंशा का और जुरअत एक दिलचस्प क़िस्सा भी है। वह क़िस्सा आप भी सुनें---

जुरअत साहब नाबीना [अंधे] थे। एक बार वो शे’र-ओ-सुखन में ध्यान मग्न थे--एक मिसरा का ख़याल आया -

 उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दैजूर की सूझी-

यानी उस [ महबूबा की जुल्फ़ों पर कालिमा अमावस्या की रात की कालिमा जैसी खिल रही है सुंदर लग रही है फब रही है}

 मिसरा उला तो हो गया ,वह बार बार इसे दुहरा रहे थे गुनगुना रहे थे कि मिसरा सानी भी बन जाए।  

इसी बीच उनके दोस्त इंशा साहब उनके घर तशरीफ़ लाए, देखा कि जुरअत मह्व-ए-ख़याल में गलतान है [ ध्यानमग्न] हैं। 

इंशा ने पूछा -" मियाँ किस ख़याल में ग़ल्तान [लीन] हो?

जुरअत ने टालना चाहा,--- नहीं नहीं कुछ नहीं --बस यूँ ही। जुरअत ने सोचा कि इंशा का क्या भरोसा। मेरा यह मिसरा  उड़ा कर अपना न शे’र बना ले।।अत: टालते रहे। मगर इंशा तो इंशा थे । मानने वाले कहाँ थे। थक हार कर जुरअत को अपना वह मिसरा सुनाना ही पड़ा।

उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दैजूर की सूझी

इंशा ने तुरन्त इस पर गिरह लगा दी। अच्छा--

अंधे को अँधेरे में बड़ी  दूर की  सूझी।

जुरअत साहब नाबीना [अंधे] थे। बात लग गई । फिर इंशा को वो सुनाया, लानत मलामत की  कि इंशा वहाँ से जो भागे तो मुड़ कर नहीं देखे।

मजाक रहा हो या तंज रहा हो--मगर शे’र में जान आ गई जर्ब-ए-उल मिस्ल बन गया कहावत की हैसियत में आ गया और ज़ुबान जद हो गया।

 मशहूर शायर कैसे बरजस्त:[ तुरन्त] गिरह लगाते है मिसरा उठाते है.क़ाबिले तारीफ़ होता है।

प्रस्तुतकर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’

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Monday, 13 July 2026

क़िस्स 001: गिरते है शह सवार ही --

 क़िस्त 001:  क़िस्सा 001: गिरते है शह सवार ही--

यह शे’र आप ने ज़रूर सुना होगा-

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने-ए-जंग में

वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले ।

[तिफ़्ल = बच्चा][ बहुवचन अत्फ़ाल]

इस शे’र को लोग अपने अपने हिसाब से सुनाते है पढ़ते है  कभी  - गिरता है शहसवार- पढ़ते हैं तो कभी - गिरते हैं शहसवार-पढ़ते हैं।

यह शे’र मालूम नहीं किसका है। इसके ख़ालिक़[रचयिता] का नाम मालूम नहीं। यह सर्क़ा किया हुआ शे’र है।

ग़ैर असल शे’र हैं। मगर यह शे’र अपने असल शे’र से कहीं ज़ियादा मक़्बूल है लोकप्रिय है ज़ुबानज़द है।

असल शे’र यूँ है -

शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें  के बल चले ।

और यह अस्ल  शे’र है -मिर्ज़ा अज़ीम बेग ’अज़ीम’ साहब का।

इस अस्ल शे’र के पीछे एक दिलचस्प वाक़या भी है। आप भी सुनें।

अज़ीम बेग साहब, सैय्यद इंशा अल्लाह ख़ाँ "इंशा" के समकालीन [ हमअस्र] थे और इंशा साहब अपने ज़माने के एक मशहूर उस्ताद शायर थे।

एक बार अज़ीम साहब अपना एक कलाम इंशा साहब को दिखाया और सुनाया। इंशा साहब ने उस कलाम को सराहा भी और दाद भी दी। हौसला अफ़ज़ाई के लिए उन्होने अज़ीम से कहा कि अगले मुशायरे में तुम यही ग़ज़ल पढ़ना।

अज़ीम साहब ने मशविरे के मुताबिक़  मुशायरे में बड़े आत्म विश्वास के साथ वही ग़ज़ल पढ़ी। मगर इंशा साहब ने भरी महफ़िल में सरे मुशायरा, इस ग़ज़ल पर तंज़ के तौर पर एक मुख़्म्मस पढ़ा, जिसका एक शे’र  यह था--

पढ़ने को सब जो यार ग़ज़ल दर ग़ज़ल चले

बह्र-ए-रजज़ में डाल कर बह्र-ए-रमल चले।

अज़ीम साहब को इंशा साहब का यह व्यवहार, यह विश्वास घात अच्छा नहीं लगा जब् कि वह अपना कलाम इंशा साहब को पहले ही दिखा चुके थे।

हो सकता है अज़ीम साहब से ही  कलाम सुनाने में  कुछ ग़लती हो गई हो।

ख़ैर अज़ीम साहब ने भी तुर्की ब तुर्की उसी बह्र में उसी वक़्त  अपना यह शे’र सुना दिया--

शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें  के बल चले ।

कभी कभी ग़ैर अस्ल शे’र -अपने असल शे’र पर भारी पड़ जाता है, ज़ियादा मक़्बूल हो जाता है ज़ियादा लोकप्रिय हो जाता है।

प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द पाठक ’आनन’-

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[स्रोत " आहंग और अरूज़ "--कमाल अहमद सिद्दिक़ी ]

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Sunday, 12 July 2026

एक सूचना

 एक सूचना -इस ब्लाग का उद्देश्य 

 उर्दू शायरी में ’उस्ताद-शागिर्द’ की परम्परा बहुत पुरानी है।समय समय पर नशिस्त [ गोष्ठी, बैठकें] मुशायर, बज़्म महफ़िल आदि के आयोजन भी होते रहते हैं।इन्हीं आयोजनों में किछ दिलचस्प वाक़यात, कुछ दिलचस्प किस्से, कुछ दिलचस्प बातें भीं निकलती रहती है। उर्दू अदब के तारीख़ निगार, नक़्क़ाद [आलोचक] मज़ामीन मुसन्निफ़ अपने अपने लेखों में, तहरीर में,इन वाक़ियात का ज़िक्र भी करते रहते हैं, हवाला देते रहते है}कुछ शायर -शायरा ऐसे क़िस्से Interviews में या अन्य सोशल मीडिया के माध्यम से सुनाते रहते है।

क़िस्सा कोताह [संक्षिप्त में ] यह कि--

 ऐसे ही  बिखरे हुए दिलचस्प क़िस्सों को, दिलचस्प बातों को एक जगह इकठ्ठा करने के उद्देश्य से बनाया गया है। ये क़िस्से प्रामाणिक स्रोतों से लिए गये है। प्राय: ऐसे क़िस्सें बातें उर्दू लिपि [ रस्म उल ख़त] में मिलते हैं अत:  हिंदी दाँ दोस्तों कि सुविधा के लिए इसे ’देव नागरी लिपि में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

 समय समय पर शे’र-0-शायरी की कुछ बातों पर, नुकते पर बातें भी करता चलूँगा

साथ ही , इसी ब्लाग में, कुछ नामचीन मा’रूफ़  क़दीम ज़दीद , कुछ अनजान गुमनाम शायरों के मशहूर अश’आर जो ज़र्ब उल मिस्ल [कहावत] की हैसियत रखते हैं और हर आम-0-ख़ास  पर ज़ुबान ज़द हैं -को भी लगाता चलूँगा ।

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इसमें मेरा कुछ भी योगदान नहीं है। ये तमाम बातें, क़िस्से ,किताबों में, इन्टर्नेट पर, सोशल मीडिया पर बिखरे पड़े हैं उपलब्ध है।मैं यहाँ मात्र ’संकलन कर्ता’ की हैसियत से प्रस्तुत कर रहा  हूँ। । इस कार्य का सारा श्रेय क्रेडिट उन बुजुर्ग मुसन्निफ़ों का, लेखको का है जो अपनी मेहनत और तहक़ीक़ी काम के असल हक़दार है। मैं उनका आभारी हूँ।
 

न कटती अगर हों जो फ़ुरक़त की रातें
पढ़ें आप शे’र-0-सुख़न की  यें बातें ।
😄😄😄😄

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सादर

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

12-07-2026

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चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा

चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा मेरे एक मित्र ने एक ’क़ता’[क़िता’] लिखा और उसका वज़न लिखा-- 22--22--22--2 और जानना चाहा कि ’ साढ़े तीन’...