Monday, 27 July 2026

शायरी 008

 शायरी 008



शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें  के बल चले ।

-मिर्ज़ा अज़ीम बेग अज़ीम-

[ मिस्ल-ए-बर्क़= बिजली की तरह]

[तिफ़्ल = बच्चा]

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अब हवाएँ ही करेंगी रोशनी का फ़ैसला

जिस दिए में जान होगी, वो दिया रह जाएगा।

- महशर बदायूनी-

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ऐसे ही और मशहूर और मकबूल शे’र यहाँ सुनें--


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