शायरी 008
शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा, जो घुटनें के बल चले ।
-मिर्ज़ा अज़ीम बेग अज़ीम-
[ मिस्ल-ए-बर्क़= बिजली की तरह]
[तिफ़्ल = बच्चा]
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अब हवाएँ ही करेंगी रोशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी, वो दिया रह जाएगा।
- महशर बदायूनी-
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ऐसे ही और मशहूर और मकबूल शे’र यहाँ सुनें--
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