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क़िस्सा 004: मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’ का दिलचस्प किस्सा---
क़िस्सा 004: मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’ का दिलचस्प किस्सा मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’[ 1714-1781] एक उस्ताद शायर थे। आप मीर तक़ी मीर के सम...
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किस्सा 002: अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी-- यह मिसरा बातचीत के क्रम में [दौरान-ए-गुफ़्तगू] कभी न कभी आप ने ज़रूर सुना होगा जब कोई आदमी ...
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क़िस्त 001: क़िस्सा 001: गिरते है शह सवार ही-- यह शे’र आप ने ज़रूर सुना होगा- गिरते हैं शहसवार ही मैदाने-ए-जंग में वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घु...
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एक सूचना - इस ब्लाग का उद्देश्य उर्दू शायरी में ’उस्ताद-शागिर्द’ की परम्परा बहुत पुरानी है।समय समय पर नशिस्त [ गोष्ठी, बैठकें] मुशायर, बज़...
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