Tuesday, 28 July 2026

चर्चा 002 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

 चर्चा 002 : मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु

 जो शायरी में अरूज़, वज़न बहर अर्कान से वाक़िफ़ होंगे, वह इस रुक्न से अवश्य परिचित होंगे।

जी हाँ यह सालिम एक रुक्न  का नाम है मगर अफ़सोस की इस सालिम रुक्न से 

कोई सालिम बह्र नहीं बनती। क्यों नहीं बनती? इसकी चर्चा आगे करेंगे।

मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु -प्रथम दृष्टया देखने में एक जैसे लगते है या एक ही लगते हैं। बहुत से हमारे मित्र

अपनी ग़ज़ल की बह्र का नाम लिखते समय एक ही समझ कर प्रयोग करते हैं और लिखते है,लेकिन

जो समझदार  हैं वो इस झंझट में नही पड़ते और बस अर्कान को ’Mathematical Form' में लिख कर आगे बढ़ जाते हैं अब आप समझते रहें कि मफ़ऊलात् है कि -मफ़ऊलातु ।

 इत्तिफ़ाक़न दोनो का Mathematical Form एक ही है यानी  -2221-

जब कि हक़ीक़तन यह एक नहीं है। अरूज़ की ज़ुबान में ये दो अलग अलग रुक्न की हैसियत रखते है।

मफ़ऊलातु - की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? मफ़ऊलात को ही सालिम रुक्न लिखने में क्या समस्या थी?

आज हम इसी पर चर्चा करेंगे।

आप निम्नलिखित अर्कान को तो जानते पहचानते होंगे?

मफ़ाईलुन् = 1 2 2 2  = बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम रुक्न

फ़ाइलातुन् = 2 1 2 2  = बह्र-ए-रमल का बुनियादी सालिम रुक्न

मुसतफ़इलुन् =2 2 1 2  = बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी सालिम रुक्न

अगर आप ध्यान से देखें तो-1- का लोकेशन क्रमश: एक स्टेप दाएँ खिसकता जा रहा है।

 तो फिरवह वहीं क्यों रुक गया? जब कि  उसे एक स्टेप और दाएँ खिसकने का हक़ भी है और गुंजाइश भी है।

जी हाँ बिलकुल सही। तो लीजिए एक स्टेप दाएँ और खिसका देते हैं।

यानी  2 2 2 1 कर देते है। जी हाँ यह भी एक सालिम रुक्न है और इसी का नाम -मफ़ऊलातु- है।

मफ़ऊलातु क्यों? मफ़ऊलात क्यों नहीं ?

 आप ऊपर के अर्कान में जो -1- देख रहे है वास्तव में वह मुतहर्रिक हर्फ़ का लोकेशन है।

चाहे मफ़ा में मीम हो, फ़ाइला में -ऐन- हो ,इलुन में -ऐन- हो, इस लोकेशन पर सब मुतहर्रिक की हैसियत में है 

और हर रुक के आख़िर में -न- [ नून ] है वो सब साकिन [ स्वर रहित] की हैसियत में क़ाबिज़ हैं

मैने  साकिन हर्फ़ को हलन्त  लगा कर् दिखा दिया है।

 अगर हम मफ़ऊलात् [ मफ़ऊलात ] लिखते तो यह भ्रम् हो जाता कि आख़िरी हर्फ़् साकिन्

है जब् कि 2221 में वस्तुत्: आख़िरी हर्फ़ मुतहर्रिक [1] है। इसी बात को differentiate करने के लिए [-ते पर पेश =तु]- लगा देते हैं  कि कहीं कोई भ्रम न रहे कि इस सालिम रुक  का आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक - है [ न कि सालिम] और यही ख़ासियत इसे अपने समूह के अन्य सालिम रुक्न से इसे अलग खड़ा करती है

जितने भी सालिम रुक्न है--चाहे--फ़ऊलुन--फ़ाइलुन--मफ़ाईलुन --फ़ाइलातुन--मुसतफ़इलुन- मुतफ़ाइलुन-मुफ़ाइलतुन सबके आखिर में न- [नून] है जो साकिन है।

मगर मफ़ऊलातु में --आख़िरी हर्फ़ --मुतहर्रिक है और किसी को कोई  confusion न रहे इसलिए -ते के ऊपर पेश-लगा कर जता दिया।

अब तो स्पष्ट हो गया होगा कि-- मफ़ऊलात्-मफ़ऊलातु-- same नहीं है देखने में भले एक लगता हो वज़न भले ही दोनो एक जैसी  2221 हैसियत रखते हों।

ऊपर मैने कहा था कि -मफ़ऊलातु - एक सालिम रुक्न् ज़रूर है मगर इससे सालिम बहर नही बनती।

यानी 2221---2221---2221---2221 में कोई ग़ज़ल नहीं कही जा सकती?

क्यों नहीं कही जा सकती?

कारण है।

 उर्दू ज़बान की हैयत [बनावट] ही ऐसी है कि इसका हर लफ़्ज़ मुतहर्रिक से शुरु होता है और साकिन पर गिरता है

और मिसरा के आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ नहीं आ सकता । आप ऊपर देखे--जितने भी सालिम अर्कान अरूज़ में डिजाइन किए गए सब के आखिर में हर्फ़-ए-साकिन  [स्वर रहित हर्फ़] है [ सिवा मफ़ऊलातु को छोड़ कर} अत: मिसरा के आख़िर में -मफ़ऊलातु- कैसे ला दे- मुतहर्रिक हर्फ़ कैसे ला दें।

एक बात और  उर्दू ज़बान में आप को कोई ऐसा लफ़्ज़ भी न मिलेगा जिसके आख़िर मे--मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो।

तो सवाल यह कि --कि फिर -मफ़ऊलातु- रुक्न बनाने की ज़रूरत क्या थी?

अरे भाई मिसरा के आखिर में नहीं आ सकता तो कोई बात नहीं--मिसरा के बीच में --शुरुआत में तो आ सकता है और आता भी है जैसे बह्र-ए-मुक्तज़िब में --। इसी लिए इसे बह्र-ए-मुक्तजिब का बुनियादी रुक्न भी कहते है

अगर मिसरा के आख़िर में आयेगा भी तो अपनी मुज़ाहिफ़ शकल [ ज़िहाफ़ शुदा शकल] में ही आएगा जो -आख़िरी हर्फ़ -तु-[ मुतहर्रिक] को साकिन कर देता हो।


-आनन्द.पाठक ;आनन’-

880092 7181


2 comments:

  1. बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी, आनंद भाई. आपके लेख पढ़कर मन ख़ुश हो जाता है.

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  2. घन्यवाद सर
    लेकिन बहुत लोगो को ऐसा विषय नीरस और उबाऊ लगता है

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