Friday, 28 August 2026

चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा


चर्चा 007: साढ़े तीन रुक्न-- एक चर्चा

मेरे एक मित्र ने एक ’क़ता’[क़िता’] लिखा और उसका वज़न लिखा--

22--22--22--2

और जानना चाहा कि ’साढ़े तीन’ रुक्न पर यह क़ता हुआ कि नहीं ?


यह चर्चा इसी ’साढ़े-तीन’ रुक्न पर है।

----

मित्र ने -22- को शायद एक रुक्न मान लिया और -2- को आधा रुक्न समझ लिया होगा ।

आप जानते है-

-रुक्न या तो सालिम होगा [अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] या फिर मुज़ाहिफ़ [ ज़िहाफ़ शुदा ] होगा अपनी पूरी शक्ल और वज़न के साथ] उसका नाम भी होगा।कोई रुक्न ’ अपने पूरे शकल और वज़न में होता है। आधा --डेढ़ा--पौना--ढैया-- नही होता।

चाहे 2 हो, 22 हो, 222 हो, ये सब Independent रुक्न है वज़न है और इनके नाम भी हैं। हम यह नहीं कह सकते कि -2- रुक्न -22- का आधा है या 222 का एक तिहाई है।


112---1212---121---12--1122- आदि-ये सब रुक्न किसी न किसी सालिम रुक्न के मुज़ाहिफ़ शकल है और अपनी Independent हैसियत रखते है। ये किसी सालिम रुक्न के न अद्धा है न पौना।


एक स्थिति की कल्पना कीजिए


22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसद्दस बह्र।

22-22-22-22 को आप क्या कहेंगे? कोई मुसम्मन बह्र।

तो

22-22-22-2 को आप क्या कहेंगे?

डेढ मुसद्दस या साढ़े मुसद्दस या पौना मुसम्मन?

यह भी एक मुसम्मन बह्र ही होगी। अद्धा--डेढ़ा--पौना रुक्न नही ।

इस -"साढ़े तीन रुक्न"-पर मित्र का अगला तर्क था-तो -फिर मीर की बहर साढ़े सात रुकनी और साढ़े पांच रुकनी क्यूँ कहते हैं ?

मेरा जवाब था--भाई मैं तो नहीं कहता। अरूज़ की किताब भी यह बात नहीं कहती। कौन लोग कहते हैं ,मालूम नहीं। वैसे हर मोड़ पर

किरदार बहुत हैं, कहते होंगे।

मीर की बह्र हमेशा 16-रुक्नी होती है और उसकी मूल बह्र यूँ होती है--

21-121-121-122// 21-121-121-12 यानी 16//14


इसमें तो कही साढ़े सात या साढ़े पाँच रुक्न दिखाई नहीं दे रहा है

बाएँ साइड मे-4 रुक्न और दाएँ साइड में भी -4 रुक्न यानी एक मिसरा में -8- रुक्न मुकम्मल दिखाई दे रहा है।

ख़ैर

-2- का नाम -फ़ा- भी और फ़े’अ भी [ फ़े-ऐन बसकून यानी -ऎन साकिन ] हो सकता है। यह सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है।


एक दिलचस्प बात और --इन अर्कान को अरबी में -अफ़ाइल-[फ़े’ल -यानी फ़े--एन---लाम ] भी कहते है॥

क्यों?

क्यों कि हमारे जितने भी सालिम या मुज़ाहिफ़ रुक्न हैं उनके नाम में--उसमें इन 3-हर्फ़[ फ़े--एन---लाम] में से -2- हर्फ़ ज़रूर मिलेंगे।

चाहे वह फ़ऊल [122] हो---फ़ाइलुन [212] हो -मुस्तफ़इलुन [2212] हो या कोई और।--फ़े-एन-लाम में से कोई न कोई 2 हर्फ़ ज़रूर आप को मिलेगा।

न हो तो आप चेक कर लें। यहाँ तक कि -222--[ मफ़-ऊ-लुन ] भी ।

यही बात मुज़ाहिफ़ रुक्न में भी है। ज़िहाफ़ लगाने से सालिम रुक्न की शक्ल-ओ-सूरत बदल जाती है कतर-ब्योंत हो जाती है तो फिर उसे किसी standard मान्य और मानूस रुक्न से बदल लेते हैं जिसमें -फ़े--एन---लाम में से कोई -2- हर्फ़ ज़रूर हो

इसीलिए मैन -2- को फ़े-अ’ [ ऐन साकिन] लिखा। हालाँकि -फ़ा [2] भॊ कोई बुरा नहीं है।


[ मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लतबयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी निशानदिही फ़रमाएँ कि यह हक़ीर खुद को दुरुस्त कर सके।

सादर

-आनन्द पाठक-’आनन’-

Thursday, 27 August 2026

क़िस्सा 007: एक दिलचस्प किस्सा ज़फ़र गोरखपुरी साहब का

 किस्सा 007 : ज़फ़र गोरखपुरी साहब का एक दिलचस्प किस्सा


देखें क़रीब से तो अच्छा दिखाई दे

इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे ।


यह शे’र "ज़फ़र गोरखपुरी" साहब का है। आप का पूरा नाम ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र था और आप तहसील बाँसगाँव, जिला गोरखपुर में 1935 में पैदा हुए थे। आप अपने समय के एक उम्दा और ज़हीन शायर थे। आप ने बम्बई [मुम्बई] में हिंदी फ़िल्मों में कुछ गीत भी लिखे मगर कोई ख़ास कामयाबी न मिली।


इनके कुछ शे’र बड़े मशहूर हुए। 1-2 बानगी देखें--


ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे

ये सब थे भीख मेरे साथ माँगने वाले।


या यह फिर-


कितनी आसानी से मशहूर किया है ख़ुद को

मैने अपने से बड़े शख़्स को गाली दी है।


देखिए एक शायर कितना दूर का सोचता है। उक्त शे’र का अमल हाल ही में काकरोच पार्टी के ’ज़ेन-जी’ वालों ने बेझिझक खुल्लम खुल्ला किया जो आप सब जानते ही है। अगर मशहूर होने का यही रास्ता है तो तौबा तौबा।

ख़ैर


खलीक़ुज़्ज़मा ’नुसरत’ साहब ने ज़फ़र साहब का एक दिलचस्प किस्सा अपनी किताब ; बरम्हल अश’आर/ ज़बानज़द अश’आर में बयान किया है । आप ने ऊपर भीख मांगने वाला शेर सुना। एक ऐसा ही शे’र उनका और है।

किस्सा कोताह यह कि --


ज़फ़र साहब एक मुशायरे में अपना एक शे’र--


अब भीख माँगने के तरीक़े बदल गए

लाज़िम नहीं की हाथ में कासा दिखाई दे।


[कासा = भिक्षा पात्र, भीख माँगने का कटोरा]


यह शे’र उपस्थित श्रोताओं को इतना अच्छा लगा कि मुकर्रर मुकर्र कहने लगे वाह वाह करने लगे और ज़फ़र साहब से यही शे’र बार बार पढ़वा रहे थे। एक सज्जन अपनी कार में बैठे यह शे’र सुन रहे थे। उन्हे भी यह शे;र इतना पसन्द आया कि अपनी कार से उतर कर सीधे स्टेज पर गए और ज़फ़र साहब को 10/- का नोट थमा दिया ।

फिर क्या था। पूरी महफ़िल में हँसी का फ़ौव्वारा छूट गया।


कभी कभी मुशायरे/महफ़िल में ऐसी घट्ना हो जाती है कि पूरा माहौल ही बदल जाता है।


प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


Tuesday, 25 August 2026

चर्चा 006 : "तू इधर उधर की न बात कर--

 एक चर्चा : "तू इधर उधर की न बात कर--


तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे

तेरी रहबरी का सवाल है, मुझे राहज़न  से ग़रज़ नहीं ।


 दर अस्ल यह शे’र "शहाब ज़ाफ़री" साहब का है।


सैय्यद वक़ार अहमद शहाब ज़ाफ़री साहब की पैदाईश जौनपुर [उ0प्र0] में हुई थी।

आजकल इस शे’र के कई रूप और कई वर्जन मिलते है। यह शे’र इतना मानीखेज़ [अर्थ पूर्ण] है कि लोग बाग मौक़े दर मौके

अपने अपने हिसाब से पढ़ते, सुनाते रहते हैं।

कहते हैं यह शे’र सबसे पहले पार्लियामेन्ट में मौलाना आज़ाद साहब ने जवाहर लाल नेहरू जी को संबोधित कर के पढ़ा था। उस वक्त ज़ाफ़री साहब की उम्र

71-साल की थी। सुषमा स्वराज जी ने भी यह शे’र एक बार संसद में किसी मौक़े पर पढ़ा था। अब तो नेतागण प्राय:मौक़े दर मौक़े समय समय पर संसद में.

 विधान सभा मे, टी0वी0 बहस मे पढ़ते रहते है जब किसी को कटघरे में खड़ा करना होता है। ख़ैर , सिद्धू साहब तो कई बार बेमौक़े भी पढ़ देते हैं 

 और अन्त में कहते हैं--ठोंको ताली।

ऐसे शे’र जब इतने मशहूर और मक़्बूल हो जाते है तब समय के अन्तराल पर इसके रूप मे कुछ बदलाव भी आ जाता है, विकॄति आ जाती है । जैसे

इसका एक रूप यह भी है-आप ने भी सुना होगा---


तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा     

तेरी रहबरी का सवाल है, मुझे राहज़न  से ग़रज़ नहीं ।


 यानी काफ़िले की जगह --काफ़िला --[एकवचन]

या फ़िर 

       तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा     

मुझे रहजनों से गिला नहीं ,तेरी रहबरी  का सवाल  है ।


यानी 

राहज़न की जगह--- रहज़नों--

ग़रज़ [12]  की जगह -गिला-[12]

और तो और मिसरा सानी को ही उलट दिया --यानी जिसको जिसमे सुविधा होती है --अपने हिसाब से इस शे’र को पढ़ता है।

आप ने अगर इस शे’र का कोई और version सुना हो तो ज़रूर बताइएगा।

बात जो भी हो शे’र का मफ़हूम बहुत साफ़ है--मानूस है--लोकप्रिय है।

अन्त में --शे’र वही जो जन जन को भावे--


प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’-


Sunday, 23 August 2026

शायरी 013

 शायरी 013


अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो

और यह भी देखते हैं कि कोई देखता न हो। 

-निज़ाम रामपुरी-

---

फितरत को नापसंद है सख़्ती बयान में

पैदा हुई न इसलिए हड्डी  ज़बान  में । 

-हबीब लखनवी-


अन्य अश’आर यहाँ सुनें--



Wednesday, 19 August 2026

शायरी 012

 शायरी 012

दिल के आईने में है तस्वीर-ए-यार
जब ज़रा गरदन झुकाई  देख ली ।

मुंशी मौजी राम ’मौजी-

-----


ये कह दो जा के वाइज़ से, अगर समझाने आए हैं
कि हम दैर-ओ-हरम से हो के फिर मयखाने आए हैं।


कृशन चन्दर ’हैरत गोण्डवी-


बाक़ी अश’आर यहाँ सुनें--



Monday, 10 August 2026

शायरी 011

 शायरी 011
:1: 

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवज़ह उदासी का सबब पूछेंगे ।
- कफ़ील अहमद ’कफ़ील’-

:2:
मैं घर में भी उससे मिलती कैसे
दीवार खड़ी थी घर के अंदर ।
किश्वर नाहीद [ शायरा]

अन्य अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं--




Sunday, 9 August 2026

शायरी 010

शायरी 010 


ये सच है किसी हाथ में पत्थर नहीं लेकिन

महफ़ूज़ नहीं कोई भी सर देख रहा हूँ ।

-इज़हार अहमद ’ नदीम-


==== =====

यही हुजूम तो रस्ते को रोकता है कभी

इसी हुजूम से रस्ता निकलता रहता है ।

-अज़हर इनायती-

अन्य अश’आर यहाँ सुनें--




Wednesday, 5 August 2026

क़िस्सा 006: मीर तक़ी मीर ---चुम्मा चाटी शायरी


क़िस्सा 006 : मीर तक़ी मीर ---चुम्मा चाटी शायरी


मीर तक़ी ”मीर’ को ख़ुदा-ए-सुख़न भी कहा जाता है और यह लकब उन्हें यूँ ही नहीं दिया गया है

या यूँ ही नहीं कहा जाता है। बड़े बड़े उस्ताद शायर भी उनकी शायरी का लोहा मानते थे।

नासिख़ अपने ज़माने के मशहूर शायर थे । उन्होने  मीर के मुतल्लिक़ एक मिसरा कहा था -

-आप बेहरा हैं जो मो’तक़िद-ए- "मीर’ नही--

इसी मिसरे का हवाला देते हुए ;ग़ालिब’ ने यह शे’र कहा था--

’ग़ालिब’ अपना तो अक़ीदा है ब-कौले-’नासिख़’

-आप बेहरा हैं जो मो’तक़िदे- "मीर’ नहीं ।

जब कि ग़ालिब साहब ख़ुद एक उस्ताद शायर थे अपने ज़माने के मशहूर शायर थे ।

ज़ौक़ ख़ुद एक उस्ताद शायर थे, मीर के बारे में यह कहा--

न हुआ पर न हुआ ’मीर’ का अंदाज़ नसीब

’ज़ौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा ।

कहने का मतलब यह कि ’मीर’ को लोग ख़ुदाए-सुखन यूँ हीं नहीं कहते। ’मीर’ साहब गंभीर और बुलंद ख़याल की शायरी करते थे। शायरी को शायरी की तरह करते थे। उनकी ग़ज़लें अश;आर मानीख़ेज़ हुआ करती थीं। उन्होने ज़िंदगी में बड़े कष्ट उठाए, ज़िंदगी ग़मगीन रही।

एक बार एक मुशायरे में जुर्रत साहब और मीर साहब शामिल थे। [जुर्रत साहब के बारें में एक किस्सा पहले ही बयान कर चुका हूँ] जुर्रत साहब ने मुशायरे में एक ग़ज़ल पढ़ी। जिसकी खूब तारीफ़ हुई। दाद-ओ-तहसीन हासिल हुआ। वाह वाह हुई। मगर मीर साहब चुपचाप बैठे रहे। मगर जुर्रत को मुशायरे में मिली दाद वाह वाह काफ़ी मालूम न हुई तो वह मीर साहब के पास आ कर बगल में बैठ गए और अपनी पढ़ी हुई ग़ज़ल के बारे में मीर साहब की राय जाननी चाही।

मीर साहब कुछ कहना नहीं चाहते थे , सो टाल-मटोल करते रहे। हाँ-हूँ करते रहे। मगर जुर्रत तो जुर्रत। पीछे ही पड़ गए तो मीर साहब को गुस्सा आ गया और बोल उठे--"मियाँ ! क़ैफ़ियत इसकी यह है कि तुम शे’र तो कहना नहीं जानते , बस अपनी ’चुम्मा चाटी’ कह लिया करो।

 बाद में जुर्रत साहब की क्या शकल हुई होगी ख़ुदा जाने।

--    ---

 ऐसे मसले पर आज भी वैसे भी और सोशल मीडिया पर  बहुत से जुर्रत है -- और मीर भी है

1-2 ग़ज़ल कही नहीं कि तुरन्त किसी  "दद्दा" के पास आकर बैठ गए फिर लगते है पूछने -दद्दा शे’र कैसा रहा,

ग़ज़ल कैसी रही? और ’दद्दा’ भी अपनी जान छुड़ाने की ग़रज़ से - अच्छा रहा- कह देते है ।

फिर क्या दूसरे दिन वो दिन भर सारे मंच पर  फ़ेसबुक पर, व्हाटस अप पर , बात  चस्पा करते रहते है फोटू लगाते रहते है ,मार्केटिंग करते रहते है- -इस शे’र को दद्दा ने आशीर्वाद दिया--इस ग़ज़ल पर दद्दा ने भी वाह वाह किया  ब्ला ब्ला ब्ला।आप भी सुनें---

कहने का मतलब यह कि यह रोग आज से नहीं ,ज़माने से है।

प्रस्तुतकर्ता

-आनन्द.पाठक’आनन’

880092 7181

चर्चा 005 : वतद-ए-मौक़ूफ़ [ --क्रमांक से आगे]


चर्चा 005 : वतद--ए-मौक़ूफ़  [ चर्चा क्रमांक 004 से आगे]


पिछली क़िस्त [चर्चा 004]  में वतद [ 3-हर्फ़ी ] शब्द पर चर्चा की थी जिसमे वतद-ए-मजमुआ और वतद-ए-मौक़ूफ़

पर विशेष चर्चा की थी।

आप जानते है कि वतद-ए-मजमुआ [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] वाले 3-हर्फ़ी शब्द का वज़न 1 2 होता है

जैसे --शजर--सहर--मरज-- अगर--्लहर --आदि

कभी आप ने सोचा है कि इन सबका वज़न 1 2 ही क्यॊ होता है - 1 1 1 - क्यों नहीं होता। आज इसी पर चर्चा करेंगे

जैसा कि पहले ही मैं बता चुका हूँ कि उर्दू ज़बान की हैय्यत [ बनावट] ही ऐसी है कि पहला हर्फ़ मुतहर्रिक और आख़िरी हर्फ़  by default  या लाज़िमन साकिन ही होता है ।

वतद-ए-मजमुआ में आप देख रहे है कि [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] में आख़िरी हर्फ़ साकिन है ही।

एक बात और -[ घड़ी भर के लिए आप कल्पना कर लें --बस कल्पना ही करें आगे और कुछ नही-हा हा हा😆😆 

मुतहर्रिक हर्फ़ --नर और साकिन हर्फ़ -मादा। तो बात समझने में कुछ आसानी हो जाएगी। इत्तिफ़ाक़न यहाँ साकिन वामांगी भी है हिंदी के लिहाज़ से ]😅😅

जब एक मुतहर्रिक हर्फ़ पास वाले साकिन हर्फ़ से मिलता है तो जोड़ा बना लेता है-2- बना लेता है [एक मन-दो बदन] जिसे अरूज़ की भाषा में --सबब- [सबब-ए-ख़फ़ीफ़] कहते है।

ख़फ़ीफ़ क्यों? अरे भाई जिसके बगल में -मादा-खड़ी हो उसकी आवाज़ ख़फ़ीफ़ ही निकलेगी मेरी तरह मीऊँ मीऊँ।

तो मुतहर्रिक का क्या हुआ ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|

वतद-ए-मजमुआ = [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन]= मुतहर्रिक +[ मुतहर्रिक+साकिन]

                    = मुतहर्रिक + सबब=    1 2

इसी लिए वतद-ए-मुजमुआ शब्द का वज़न 1 2 आता है या लिया जाता है। 

अब इसी समूह के कुछ शब्द देखते है--[ ख़याल रहे आख़री हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा]

ख़बर = ख़+बर  =1 2

अबद= अ+बद  = 1 2 [ हमेशा]

हरज = ह+ रज = 1 2 [ क्या हरज है?

सफ़र = स+ फ़र = 1 2 [ ज़िंदगी का सफ़र]

ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़----

ठीक यही बात वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन ] के साथ है -

वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन

                = [ मुतहर्रिक+साकिन] + साकिन 

                = सबब+ साकिन= 2 1 

फिर आख़िर वाले साकिन का क्या हुआ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|

अब कुछ शब्द वतद-ए-मौक़ूफ़ के देखते हैं--ख़याल रहे आख़िरी हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा--और दूसरे मुक़ाम वाला  हर्फ़ भी साकिन [स्वर रहित] है

अस्ल = अस+ ल = 2 1 = ओरिजनल

कब्र  = कब +र    = 2 1 

जुर्म  = जुर  +म    =2 1  [ अपराध]

सर्द  = सर +द    = 2 1  [ ठंडा]

ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़

यही कारण है कि वतद-ए-मौक़ूफ़ वाले शब्द 2 1 के वज़्न पर आते हैं या लिए जाते हैं।

आप ने देखा -1- दोनो ही हर्फ़ के लिए प्रयोग हुआ --हर्फ़ चाहे मुतहर्रिक हो या साकिन। इसी लिए 1 2 12 जैसी

अलामात  अफ़ाइल दिखाने के लिए बहुत मुफ़ीद या full proof व्यवस्थ   नहीं मानते हैं।

 ख़ैर।

अब आगे बढ़्ते है। ऐसा नहीं कि उर्दू में सिर्फ़ 2-हर्फ़ी या 3- हर्फ़ी शब्द ही होते हैं। चार हर्फ़ी शब्द भी होते है जिसे

अरूज़ की भाषा में फ़ासिला कहते  हैं -विशेष रूप से फ़ासिला सुग़्रा।  अगरचे इस की ज़रूरत आप को पड़ेगी नहीं मगर जानने में क्या बुराई। अर्कान का काम वतद और सबब की जानकारी से ही चल जाएगा। अब चूँकि अरूज़ियों ने परिभाषा गढ़ दी तो चर्चा कर ही लेते हैं।

फ़ासिला के दो शब्द लेते है --

हरकत और बरकत --इसी से समझने की कोशिश करते हैं यानी 3- मुतहर्रिक +1 साकिन [आख़िरी वाला]

बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

यानी आख़िर में साकिन तो आना ही था ,बाक़ी सब पर [ ब-र-क पर] जबर की हरकत लगी हुई है।

तो बरकत का वज़न क्या होगा ?

बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

    = मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + [मुतहर्रिक + साकिन ] 

    = मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक  + सबब [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़]

    =  1         1          2    =  112 

अब 1 1 [ मुतहर्रिक+मुतहर्रिक] को क्या बोलें? अरूज़ की भाषा में यह भी सबब  की हैसियत का  1 1 मिल कर दो तो हैं मगर अलग अलग खड़े है

अपने अपने सर पर हरकत का बोझ लिए खड़े है --यानी सकील है भारी है।

इसीलिए 1 1 को सबब-ए-सकील कहते है

यानी बरकत शब्द = सबब-ए-सकील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़  से भी बना माना जा सकता है।

जब हम अफ़ाइल [रुक्न] को सबब--ए-  सकील और सबब-ए- खफ़ीफ़ से दिखा सकते है --तो फ़ासला की  ज़रूरत क्या । इसके बिना भी काम चल जाएगा।

यही बात शब्द ’हरकत’ के लिए भी और ऐसे बहुत से शब्द के लिए भी।

चलते चलते--

आप इन सब अरूज़ के चक्कर में मत पड़िए --आप अपनी शायरी करते चलिए -जैसे कर रहे हैं । यह सब अरूज़ियों के चोचले हैं।

यह तो बस बात निकली तो चर्चा कर लिय॥

सादर 

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181


Monday, 3 August 2026

चर्चा 004: वतद -- वतद-ए-मौक़ूफ़

चर्चा 004: वतद -- वतद-ए-मौक़ूफ़

पिछले चर्चा में मैने वतद-ए-मौक़ूफ़ की बात की थी।

[Disclaimer Caluse: यह मजमून उन अह्बाब के लिए है जों अरूज़ की बुनियादी इस्तेलाहात से वाक़िफ़ होना चाहते है।

 आप वतद [बहुवचन औदात] के बारे में जानते होंगे। उर्दू में 3-हर्फ़ी अल्फ़ाज़ को ’वतद’ कहते हैं जिसे हिंदी में हम ’त्रिकल’ कहते हैं ।हम यहाँ त्रिकल-द्विकल की चर्चा नहीं करेंगे । हिंदी की बात हिंदीं व्याकरण से--उर्दू की बात उर्दू क़वायद [ उर्दू व्याकरण] से। 

अगर हम ग़ज़ल की बात करते है, बह्र, अर्कान[ अफ़ाइल] की बात करते है, हर्फ़ के दबाने गिराने [पतन]की बात करते हैं ज़िहाफ़ात की बात करते हैं

 तो उर्दू व्याकरण ही ’फ़ालो’ करना पड़ेगा। अरूज़ की बात माननी ही पड़ेगी। यह नहीं कि अपनी सुविधानुसार कभी हिंदी, कभी उर्दू व्याकरण की बात करें।

हिंदी-उर्दू व्याकरण  के इस प्रकार के ’घाल-मेल’ से एक ला-हासिल  बहस शुरु हो जाती है और पाठको को, नौ-मश्क़ शायरों के मन में भ्रम पैदा हो जाता है।

 एक बात ध्यान रखने की है-- 

-उर्दु ज़ुबान की हैय्यत [बनावट] ही ऐसी है कि उर्दू के किसी शब्द का -पहला हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ और आख़िरी हर्फ़ ’साकिन’ होता है।

अब आप कहेंगे यह मुतहर्रिक-साकिन क्या बला है?साहिब ये बला नहीं --शब्द निर्माण की कला है। चलिए एक संक्षिप्त चर्चा मुतहर्रिक- साकिन हर्फ़ पर कर लेते हैं।

आप जानते है- उर्दू वर्णमाला [ हरूफ़-ए-तहज्जी] में जितने भी हर्फ़ होते हैं सभी मूलत: साकिन [स्वर रहित] होते है। मगर मात्र इन साकिन  हर्फ़ से शब्द नहीं बन सकते जब तक कि इन स्वर रहित हर्फ़[ साकिन] पर कोई ’हरकत’ न लगाएँ। उर्दू में मुख्यत: तीन हरकत [ ज़ेर--ज़बर-पेश] होते है और इन हरकात को लगाते ही हर्फ़ एक ख़ास आवाज़ देने लगता है। हरकत शुदा हर्फ़ को ही ’ मुतहर्रिक’ कहते हैं

जैसे अब-कमल--असर-लहर --बसर--बशर-- सबमें पहले हर्फ़  [ यानी -क -अ-ल-ब ] पर जबर- की हरकत लगी हुई है--चाहे इमला में दिखावें या न दिखावें

उसी तरह - उस-खुश -बुत --के पहले हर्फ़ पर -पेश की हरकत लगी होती है।

यह सब बेसिक बातें किसी भी उर्दू व्याकरण की या इन्टेरेनेट पर आराम से मिल जाएगी।

अब वतद पर आते है-- 3 हर्फ़ी शब्द को ’वतद’ कहते है 

मुतहर्रिक-साकिन इन 3-अदद हर्फ़  से निम्नलिखिता संभावनाएँ [इमकानात] हो सकती है

[अ] मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन

[ब] मुतहर्रिक+  साकिन   + मुतहार्रिक

[स]  मुतहर्रिक + साकिन   + साकिन


यानी पहले मुक़ाम पर मुतहर्रिक और आख़िरी मुक़ाम पर साकिन लाना ही लाना है। और कोई संभावना बनती हो तो बताएँ।

[अ] मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन = अरूज़ियों ने इसका नाम --वतद-ए-मज्मुआ  दिया। मज्मुआ इसलिए की दो मुतहर्रिक हर्फ़

एक साथ जमा हो गए-सो मज़मुआ। और इनका वज़न हमेशा - 12- होता है

सहर--लहर--असर--रक़म--बदल--बरस- मरज--गरज़- शजर -  आदि सैकड़ों अल्फ़ाज़

और अर्कान में मफ़ा--इला--इलुन--सब वतद-ए-मज्मुआ हैं


[ब] मुतहर्रिक+  साकिन   + मुतहार्रिक = अरूज़ियों ने इसका नाम --वतद-ए-मफ़रूक - दिया। कारण की दो मुतहारिक के बीच

फ़र्क आ गया --एक साथ नहीं है--सिलसिलेवार नही है --इसलिए मफ़रूक

उर्दू में ऐसा कोई लफ़्ज़ नहीं मिलेगा जिसके आख़िर में मुतहर्रिक हर्फ़ आता हो। ऊपर पहले ही यह बात बता दी है। तो इसकी ज़रूरत क्या थी

ज़रूरत थी --अर्कान बनाने में-

कभी कभी इज़ाफ़त और अत्फ़ के अमल से ऐसे शब्द बन जाते हैं।


[स]  मुतहर्रिक + साकिन   + साकिन = अरूज़ियों ने  इस arrangement का नाम दिया --वतद-ए-मौक़ूफ़ । यह अर्कान बनाने के काम नही आता

यह किसी अर्कान [ अफ़ाइल ] में आता भी नहीं। ऐसे सैकड़ो अल्फ़ाज़ उर्दू में  आप को मिल जाएंगे और इनका वज़न हमेशा -21- होगा

जैसे अब्र--अक़्ल--अम्न--शह्र--ज़ह्र--चर्ख़ [आसमान] ----

 अब  कुछ और अल्फ़ाज़ वतद-ए-मजमुआ पर पेश करते है--जिसका वज़न - 12-होगा-

अबद--असर--अजल--ख़बर--खिरद--रक़म --शुतुर [ऊँट]--शिकम[पेट] --वग़ैरह वग़ैरह -एक लम्बी फ़ेहरिस्त।

 अब कुछ और अल्फ़ाज़  वतद-ए-मौक़ूफ़ का पेश करते है --जिसका वज़न हमेशा --21 --पर होगा

उर्द-अस्र-ज़ख्म -दर्द-जुर्म--हर्फ़--ख़ुश्क--जिस्म-हर्ब-ज़ुह्द-- वग़ैरह वग़ैर्ग --एक लम्बी फ़ेहरिस्त

उर्दू शब्दों का सही वज़न निकालने के लिए -सही तलफ़्फ़ुज़ जानना ज़रूरी है और इसमे कोई मुस्तनद लुग़त [ उर्दू का प्रामाणिक शब्दकोश]

अगर आप को हर्फ़ के हरकत -साकिन का आइडिया हो गया तो शब्द का वज़न [ मात्रा भार] ब आसानी निकाला जा सकता है।

आप की मदद कर सकता है।

अब मरजी आप की--कि 

शह्र को शहर कहें 

ज़ह्र को ज़हर कहें

बह्र को बहर कहें

अक़्ल को --अकल कहें

या फिर 


मरज को मर्ज कहते है

गरज को गर्ज कहते है 

या नज़र को नज़्र कहते है --अरे हाँ इसे कह सकते है 😀😀

नज़र[12] निगाह

नज़्र [21] भेंट 

आप कोशिश करेंगे तो बहुत से शब्द मिल जाएँगे। आप चाहें तो ऐसी सूची आप खुद बना सकते हैं--फिर तो आप को पूछने की ज़रूरत ही न पड़ेगी

कि फ़लाना शब्द का वज़्न क्या होगा ?

सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’-

880092 7181

Saturday, 1 August 2026

क़िस्सा 005: सैय्यद मुहम्मद मीर ’सोज़’ --एक दिलचस्प क़िस्सा

 

क़िस्सा 005 :सैय्यद मुहम्मद मीर ’सोज़’ --एक दिलचस्प क़िस्सा


 सैय्यद मुहम्मद मीर साहब,  मीर तक़ी मीर के ज़माने के शायर थे या यह कहें कि 

समकालीन शायर थे। मुहम्मद मीर साहब, शुरु शुरु में अपना ’तख़ल्लुस ’मीर’ ही रखा था

लेकिन जब उन्होने देखा कि मीर तक़ी मीर का भी तख़ल्लुस ’मीर’ ही है तो उन्होने अपना 

उपनाम बदल कर-सोज़-रख लिया।

सोज़ साहब दिल्ली में पैदा हुए थे और अन्त में लखनऊ आ गए नवाब आसुफ़द्दौला के उस्ताद हो गए।

 सोज़ साहब एक ज़हीन शायर थे। उनकी ज़बान मीठी ज़बान थी, मुहावरेवाली ज़बान थी ।

उन्होने कई मशहूर शे’र कहें हैं--उदाहरण स्वरूप 1-2 शे’र यहाँ लिख रहा हूँ


तड़पती क्यों हैं ऎ बुलबुल ! कमाल इतना तो पैदा कर

कि तेरा अश्क जिस जा गिर पड़े गुलज़ार पैदा  हो ।

[ जा= जगह]

या

जिसको नित देखते थे अब उनका

देखना ही अब ख़याल-ओ-ख़्वाब हुआ।

कहते है--

सोज़ साहब का ग़ज़ल पढ़ने का अन्दाज़ भी ख़ूब था । हर शायर का अगर अपना

अन्दाज़-ए-बयाँ होता है तो अन्दाज़-ए-ग़ज़लगोई भी होता है। लखनऊ के आदिल साहब का 

अन्दाज़ आप ने देखा होगा जब वो अपनी मज़म -आदमी को अगर पूँछ होती--पढ़ते है

या राहत इन्दौरी का अन्दाज़ आप ने देखा होगा लगता है कि वह आसमान से कोई शे’र खॊंच

कर लाते है और श्रोताओं के सामने उछाल देते हैं। ख़ैर अन्दाज़ अपना अपना।

 सोज़ साहब के पढ़ने का भी अन्दाज़ निराला था। तरन्नुम में पढते थे और इस तरह से हाव भाव प्रदर्शित करते थे

इस अदा से बल खा कर पढ़ते थे कि लगता था कि वह खुद ही मज़मून की सूरत बन गए -ग़ज़ल के 

पैकर में घुस गए।

जब उन्होने एक क़िता पढ़ा-


गए घर से जो हम अपने सबेरे

सलाम अल्लाहख़ाँ साहब के डेरे

वहाँ देखे कई तिफ़्ले-परीरू

अरे रे-रे अरे रे-रे अरे-रे ।

[तिफ़्ले-परीरू = कमसिन हसीन सुंदरियाँ]


चौथा मिसरा इस अन्दाज़ से पढ़ा कि पढ़ते पढ़ते ज़मीन पर गिर पड़े जैसे उन हसीन कमसिन सुंदरियों को देखते 

दिल बेकाबू हो गया

होता भी क्यों न !

शायर आदमी जो थे।


प्रस्तुतकर्ता

आनन्द.पाठक ’आनन’

8800927181


शायरी 009

शायरी 009

बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का

जो चीरा तो इक क़तरा-ए-खूँ न निकला।

-हैदर अली ’आतिश’-

----

ये चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारो जानवर

अपनी अपनी बोलियाँ सब बोल कर उड़ जाएँगे।

-बहादुर शाह ज़फ़र-

ऐसे ही अन्य मशहूर अश’आर यहाँ सुनें---


शायरी 016

शे’र-0-शायरी 016 इस शह्रे-खराबी में ग़मे-इश्क़ के मारे ज़िंदा हैं, यही बात बड़ी बात है प्यारे । -हबीब जालिब- ----- अजीब सोच है इस शहर के मकीनों ...