Saturday, 22 August 2026

शायरी 013

 शायरी 013


अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो

और यह भी देखते हैं कि कोई देखता न हो। 

-निज़ाम रामपुरी-

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फितरत को नापसंद है सख़्ती बयान में

पैदा हुई न इसलिए हड्डी  ज़बान  में । 

-हबीब लखनवी-


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