शायरी 013
अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो
और यह भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।
-निज़ाम रामपुरी-
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फितरत को नापसंद है सख़्ती बयान में
पैदा हुई न इसलिए हड्डी ज़बान में ।
-हबीब लखनवी-
अन्य अश’आर यहाँ सुनें--
चर्चा 009 : त्रिपदी -बनाम- मुसल्लस विधा किसी मंच पर मैने अपनी एक दो त्रिपदी लगाई थी-- प्यार मुहब्बत इश्क़ वफ़ा सब सुनने में लगता है अच्छा ...
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