शायरी 013
अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो
और यह भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।
-निज़ाम रामपुरी-
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फितरत को नापसंद है सख़्ती बयान में
पैदा हुई न इसलिए हड्डी ज़बान में ।
-हबीब लखनवी-
अन्य अश’आर यहाँ सुनें--
शे’र-0-शायरी 016 इस शह्रे-खराबी में ग़मे-इश्क़ के मारे ज़िंदा हैं, यही बात बड़ी बात है प्यारे । -हबीब जालिब- ----- अजीब सोच है इस शहर के मकीनों ...
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