Wednesday, 15 July 2026

क़िस्सा 002: अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी--

 किस्सा 002: अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी--

यह मिसरा बातचीत के क्रम में [दौरान-ए-गुफ़्तगू] कभी न कभी आप ने ज़रूर सुना होगा जब कोई आदमी बहुत 

दूर की सोचता है, अपनी क्षमता से ज़ियादा सोचता है जब कि सामने वाले आदमी को उससे यह उमीद नहीं होती।

अमूमन यह मिसरा बतौर तंज़ पढ़ा जाता है ।

 असल में यह एक शे’र का मिसरा सानी है और पूरा शे’र यूँ है --ज

उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दैजूर की सूझी

अंधे को अँधेरे में बड़ी  दूर की  सूझी।

[ शब-ए-दैजूर = अमावस्या की रात की कालिमा ]ो

 कुछ लोग मिसरा सानी को --बहुत दूर की सूझी-- कह कर पढ़ते है जब कि कुछ लोग --बड़ी दूर की सूझी --कह कर सुनाते है।

ऐसा इसलिए हो जाता कि ऐसे बरमहल [ मौक़े के मुताबिक़]   मशहूर शे’र  सुनते- सुनाते इतने घिस जाते हैं कि सुनाने वाले को  असल शे’र के रूप का पता ही नहीं रहता।

और वैसे भी -बड़ी-[12] और बहुत [12] समान वज़न होने के कारण ब आसानी शे’र में ऐसे ख़्ल्त मल्त [ घुल मिल ] जाते है कि पता ही नही चलता।

वैसे ही कहीं कहीं आप को शब-ए-दीजूर-  छपा लिखा मिल जाएगा जब कि कहीं कहीं दैजूर छपा मिलेगा।

 सही शब्द ’दैजूर’ ही है}

ख़ैर  इस शे’र का एक दिलचस्प वाक़या है--

दर अस्ल यह शे’र दो मुख़्तलिफ़ शायरों के अलग अलग कहे गए मिसरों से बना है।

पहला मिसरा [ मिसरा ऊला ] अपने ज़माने के मशहूर शायर शेख़ कलन्दर बख़्श ’जुरअत’ का है जब कि दूसरा मिसरा इन्शा अल्लाह खाँ ’इंशा’ का है । इंशा अपने ज़माने के मशहूर शायर थे और जुरअत के दोस्त भी थे।

इंशा साहब बिला शक एक जहीन और अच्छे शायर थे, मगर एक दरबारी शायर थे। इस कारण उनके व्यक्तित्व में 

कुछ कमियाँ भी थी जैसे अपने आका की ख़ुशामदी, चापलूसी, दरबाए के अन्य शायरों को नीचा दिखाना,हिजोबाजी करना, तंज़ कसना बग़ैरह।

ख़ैर। इंशा का और जुरअत एक दिलचस्प क़िस्सा भी है। वह क़िस्सा आप भी सुनें---

जुरअत साहब नाबीना [अंधे] थे। एक बार वो शे’र-ओ-सुखन में ध्यान मग्न थे--एक मिसरा का ख़याल आया -

 उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दैजूर की सूझी-

यानी उस [ महबूबा की जुल्फ़ों पर कालिमा अमावस्या की रात की कालिमा जैसी खिल रही है सुंदर लग रही है फब रही है}

 मिसरा उला तो हो गया ,वह बार बार इसे दुहरा रहे थे गुनगुना रहे थे कि मिसरा सानी भी बन जाए।  

इसी बीच उनके दोस्त इंशा साहब उनके घर तशरीफ़ लाए, देखा कि जुरअत मह्व-ए-ख़याल में गलतान है [ ध्यानमग्न] हैं। 

इंशा ने पूछा -" मियाँ किस ख़याल में ग़ल्तान [लीन] हो?

जुरअत ने टालना चाहा,--- नहीं नहीं कुछ नहीं --बस यूँ ही। जुरअत ने सोचा कि इंशा का क्या भरोसा। मेरा यह मिसरा  उड़ा कर अपना न शे’र बना ले।।अत: टालते रहे। मगर इंशा तो इंशा थे । मानने वाले कहाँ थे। थक हार कर जुरअत को अपना वह मिसरा सुनाना ही पड़ा।

उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दैजूर की सूझी

इंशा ने तुरन्त इस पर गिरह लगा दी। अच्छा--

अंधे को अँधेरे में बड़ी  दूर की  सूझी।

जुरअत साहब नाबीना [अंधे] थे। बात लग गई । फिर इंशा को वो सुनाया, लानत मलामत की  कि इंशा वहाँ से जो भागे तो मुड़ कर नहीं देखे।

मजाक रहा हो या तंज रहा हो--मगर शे’र में जान आ गई जर्ब-ए-उल मिस्ल बन गया कहावत की हैसियत में आ गया और ज़ुबान जद हो गया।

 मशहूर शायर कैसे बरजस्त:[ तुरन्त] गिरह लगाते है मिसरा उठाते है.क़ाबिले तारीफ़ होता है।

प्रस्तुतकर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’

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