शायरी 011
:1:
:1:
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवज़ह उदासी का सबब पूछेंगे ।
- कफ़ील अहमद ’कफ़ील’-
:2:
मैं घर में भी उससे मिलती कैसे
दीवार खड़ी थी घर के अंदर ।
किश्वर नाहीद [ शायरा]
अन्य अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं--
शायरी 021 यूँ ही शायद मिल सके होने न होने का सुराग अब मुसलसल खुद के अंदर झाँकता रहता हूँ मैं। अनवर महमूद ख़ालिद- ये भी शायद ज़िंदगी की एक अदा...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें