शायरी 010
ये सच है किसी हाथ में पत्थर नहीं लेकिन
महफ़ूज़ नहीं कोई भी सर देख रहा हूँ ।
-इज़हार अहमद ’ नदीम-
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यही हुजूम तो रस्ते को रोकता है कभी
इसी हुजूम से रस्ता निकलता रहता है ।
-अज़हर इनायती-
अन्य अश’आर यहाँ सुनें--
शायरी 013 अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो और यह भी देखते हैं कि कोई देखता न हो। -निज़ाम रामपुरी- --- फितरत को नापसंद है सख़्ती बयान में पैद...
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