शायरी 010
ये सच है किसी हाथ में पत्थर नहीं लेकिन
महफ़ूज़ नहीं कोई भी सर देख रहा हूँ ।
-इज़हार अहमद ’ नदीम-
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यही हुजूम तो रस्ते को रोकता है कभी
इसी हुजूम से रस्ता निकलता रहता है ।
-अज़हर इनायती-
अन्य अश’आर यहाँ सुनें--
शे’र-0-शायरी 016 इस शह्रे-खराबी में ग़मे-इश्क़ के मारे ज़िंदा हैं, यही बात बड़ी बात है प्यारे । -हबीब जालिब- ----- अजीब सोच है इस शहर के मकीनों ...
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