शायरी 010
ये सच है किसी हाथ में पत्थर नहीं लेकिन
महफ़ूज़ नहीं कोई भी सर देख रहा हूँ ।
-इज़हार अहमद ’ नदीम-
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यही हुजूम तो रस्ते को रोकता है कभी
इसी हुजूम से रस्ता निकलता रहता है ।
-अज़हर इनायती-
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चर्चा 009 : त्रिपदी -बनाम- मुसल्लस विधा किसी मंच पर मैने अपनी एक दो त्रिपदी लगाई थी-- प्यार मुहब्बत इश्क़ वफ़ा सब सुनने में लगता है अच्छा ...
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