Saturday, 8 August 2026

शायरी 010

शायरी 010 


ये सच है किसी हाथ में पत्थर नहीं लेकिन

महफ़ूज़ नहीं कोई भी सर देख रहा हूँ ।

-इज़हार अहमद ’ नदीम-


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यही हुजूम तो रस्ते को रोकता है कभी

इसी हुजूम से रस्ता निकलता रहता है ।

-अज़हर इनायती-

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