क़िस्सा 009: किस्सा दयाशंकर ’नसीम’--तब तो एक सूरत भी थी--
बुतों की गली छोड़ कर कौन जाए
यहीं से काबे को सजदा हमारा ।
-पण्डित दयाशंकर ’नसीम’-
यह शे’र पं दया शंकर नसीम साहब का है। लखनऊ में पैदा हुए। इनके पिता का नाम
पं गंगा प्रसाद कौल था। काश्मीरी ब्राह्मण थे। नसीम साहब अपने ज़माने के मशहूर शायर
थे। आतिश और नासिख़ के हम अस्र [ समकालीन थे। इनकी मसनवी -’गुलज़ार-ए-नसीम’
बहुत मशहूर किताब है जो उस ज़माने में काफी सराही गई।
एक बार एक मुशायरे में अन्य लोगों के साथ ख़्वाज़ा हैदर अली ’आतिश साहब
और शेख़ इमाम बख़्श ’नासिख’ साहब दोनॊ मौज़ूद थे। दोनों ही अपने ज़माने के मशहूर उस्ताद
शायर थे जिनके दर्जनों शागिर्द थे ।ख़ैर।
मुशायरा शुरू होने के पहले नासिख साहब, नसींम साहब से मुख़ातिब हुए और कहा--
’पण्डित जी ! एक मिसरा कहा है --दूसरा मिसरा सूझ नहीं रहा है कि शे’र हो जाए।
पण्डित जी ने कहा --फ़र्माइए
नासिख ने मिसरा पढ़ा--
- शेख़ ने मसजिद बना, मिसमार बुताख़ाना किया-
[यानी शेख़ ने मंदिर ढहा कर [ मिसमार] ,मसजिद बना दिया।]
पं जी के मुख से बेसाख़्ता यह मिसरा सरजद हो गया और गिरह लगा दी--
तब तो एक सूरत भी थी, अब साफ़ वीराना किया -
इतना सुनना था कि वहाँ उपस्थित सभी लोग वाह वाह करने लगे । हर तरफ़ से
इरशाद इरशाद की आवाज़ आने लगी।
उस्ताद शायर उस्ताद ही होते हैं।
बज़ाहिर तो नहीं, मगर हाँ नासिख साहब ने शायरी की आड़ में मजहबी चोट ज़रूर की थी।
मगर नसीम साहब ने मामला उलटा कर दिया।
ख़ैर-
अब सवाल यह कि मिसरा ऊला नासिख साहब का है और मिसरा सानी नसीम साहब का है--
तो पूरा शे’र किसका ?
- शेख़ ने मसजिद बना, मिसमार बुताख़ाना किया-
तब तो एक सूरत भी थी, अब साफ़ वीराना किया -
पूरा शे’र जिसका हो आप तो बस आनन्द उठाएँ
प्रस्तुतकर्ता--
-आनन्द पाठक ’आनन’--
[ साभार - शे’र-0-सुखन [भाग-1] अयोध्या प्रसाद गोयलीय--]
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