Thursday, 17 September 2026

किस्सा 008: मीर तक़ी मीर --अब के भी दिन बहार के ---[ भाग-2]

 किस्सा  008 : मीर तक़ी मीर --अब के दिन बहार के -[ भाग-2]


पिछली क़िस्त [007] में मीर के एक किस्से का ज़िक्र किया था कि कैसे वह अपने कमरे में शे’र का एक मिसरा 

गुनगुना रहे थे--

अब के दिन बहार के यूँ ही गुज़र गए

यह वाक़िया मुहम्मद हुसैन आज़ाद साहब [1833-1910] ने अपनी किताब ’आब-ए-हयात’ में ज़िक्र किया गया है।

कुछ लोगो का आज़ाद साहब की बहुत सी बातों पर इख़्तिलाफ़ भी है । कुछ लोगो का मानन है कि हो सकता है

घटना सही हो मगर उसका विवरण जिस ढंग से किया गया है वब बहुत सही नही है। 

अली सरदार जाफ़री साहब ने अपनी किताब ’दीवान-ए-मीर- में भी इस घटना का [ आब-ए-हयात से साभार] 

ज़िक्र किया है। मगर मिसरा यूँ लिखा है--[गुज़र गए नहीं लिखा]

-अब के भी दिन बहार के यूँ ही चले गए-

और यह भी लिखा है कि मिसरा मीर का नहीं है बल्कि ’सौदा’ का है--पूरा शे’र यूँ है 


अब के भी दिन बहार के यूँ ही चले गए

फिर फिर गुल आ चुके प सजन तुम भले गए।


मीर के गुज़रे ज़माना गुज़र गया । और उन दिनो कोई इतिहास लेखन का काम विधिवत तो होता नहीं था 

अत: जो कुछ भी किस्से कहानी इन शायरों के बाबत है प्राय: सब जनश्रुति के आधार पर हैं सुने सुनाए के 

आधार पर  हैं। क्या सच है कितना सच है ख़ुदा जाने। वैसे जो भी हो कलाम बेहद खूबसूरत है क़ाबिल-ए-दाद है।

इधर फ़ेसबुक और सोशल मीडिया के आविर्भाव से इस शे’र के कई वर्जन तैरते रहते है । सबके अपने अपने वर्जन। हद तो तब हो गई जब गूगल महोदय ने इसे  मशहूर शायर मजाज़ लखनवी (असरार-उल-हक़ मजाज़) का बता दिया और कुछ शे’र भी लिख दिए है ।हो सकता है मज़ाज साहब ने इसी ज़मीन और गिरह परकुछ अश’आर /ग़ज़ल कहे हों-- आप भी आनन्द उठाएं~--


अब के दिन बहार के यूँ ही गुज़र गए

हम हाथ मलते रह गए, आँसू निकल गए।


वो आए थे तो जैसे बहार आ गई थी यहाँ,

वो क्या गए कि सारे नज़ारे बदल गए।


दिल की धड़कनों में रहा उनका ही ख़याल,

हम ख़ुद को ढूँढते हुए जाने कहाँ निकल गए।

मजाज़ लखनवी साहब का कलाम इतना पुराना भी नही है कि इसकी तहक़ीक़ात न की जा सके कि ये अश;आर उनके किसी मज़्मुआ में शामिल है भी या नहीं। कोई सुधी पाठक गण इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता है।

ख़ैर

किस्से कहानियों का क्या है, किस्से तो किस्से होते है।

सादर

प्रस्तुतकर्ता

-आनन्द पाठक ’आनन’-

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