Thursday, 17 September 2026

शायरी 017 :


शायरी 017

:!;
उमीद तो बँध जाती, तस्कीन तो हो जाती
वादा न वफ़ा करते,  वादा तो किया  होता। 

-चिराग हसन ’हसरत-

:2:
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
हँसी आ रही है तेरी  सादगी पर ।   

-गोपाल मित्तल-

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