शायरी 017
:!;
उमीद तो बँध जाती, तस्कीन तो हो जाती
वादा न वफ़ा करते, वादा तो किया होता।
-चिराग हसन ’हसरत-
:2:
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
हँसी आ रही है तेरी सादगी पर ।
-गोपाल मित्तल-
अन्य शे’र यहाँ सुनें---
क़िस्सा 009: किस्सा दयाशंकर ’नसीम’--तब तो एक सूरत भी थी-- बुतों की गली छोड़ कर कौन जाए यहीं से काबे को सजदा हमारा । -पण्डित दयाशं...
No comments:
Post a Comment