क़िस्सा 007 : मीर तक़ी मीर ---अब के दिन बहार के
जो लोग शे’र-0-शायरी का शौक़ फ़रमाते है उन्होने मीर तक़ी मीर का नाम ज़रूर सुना होगा
या उनके कलाम से साबिका ज़रूर हुए होंगे। उनका यह शे’र तो आज भी लोगों
के ज़बान पर क़ायम है--
इब्तिदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या ।
मीर उस्ताद शायर थे। उनकी शायरी का बड़े बड़े उस्ताद शायर भी लोहा मानते थे।
उन्हें ख़ुदा-ए-सुख़न भी कहा जाता है और यह लकब उन्हें यूँ ही नहीं दिया गया है
या यूँ ही नहीं कहा जाता है।
नासिख़ अपने ज़माने के मशहूर शायर थे । उन्होने मीर के मुतल्लिक़ एक मिसरा कहा था -
-आप बेहरा हैं जो मो’तक़िद-ए- "मीर’ नही--
इसी मिसरे का हवाला देते हुए ;ग़ालिब’ ने यह शे’र कहा था--
’ग़ालिब’ अपना तो अक़ीदा है ब-कौले-’नासिख़’
-आप बेहरा हैं जो मो’तक़िदे- "मीर’ नहीं ।
जब कि ग़ालिब साहब ख़ुद एक उस्ताद शायर थे अपने ज़माने के मशहूर शायर थे ।
अकबर इलाहाबादी साहब ने मीर के मुतल्लिक़ यह शे’र कहा था-
मैं हूँ क्या चीज़ जो इस तर्ज़ पर जाऊँ ’अकबर’
’नासिख-0-ज़ौक़’ भी चल न सके ’मीर’ के साथ।
कहने का मतलब यह कि मीर को लोग यूँ ही ख़ुदा-ए-सुख़न तो नहीं कहते।
ख़ैर
मीर साहब के मुतल्ल्कि कई किस्से भी मशहूर है। एक किस्सा इसी मंच पर पहले भी बयान
कर चुका हूँ। मेरे ब्लाग पर भी उपलब्ध है--
https://akp317.blogspot.com/2026/08/006.html
आज एक और किस्सा बयान कर रहा हूँ । इस किस्से का ज़िक्र ’आब-ए-हयात’ में मुहम्मद हुसेन ’आज़ाद’
साहब ने किया है जिसको फ़िराक़ गोरखपुरी साहब ने भी अपने एक मज़्मून में भी इसका ज़िक्र किया है ।
आप भी सुने; आनन्द उठाएँ- किस्सा कोताह यह कि--
"मीर’ के किसी कद्रदान ने उनको रहने के लिए एक हरे-भरे फूले फले बाग़ में बना हुआ एक मकान दिया
मीर के रहने के कमरे में बनी खिड़की खोलने पर वह लहलहाता बाग़ नज़र आता। लेकिन एक बार जब वो आदमी मीर से मिलने
गया तो देखा कि वह खिड़की महीनों से खुली ही नहीं और बन्द कमरे में मीर साहब यह मिसरा गुनगुना रहे थे--
-अब के दिन बहार के यूँ ही गुज़र गए--
देखा कि कमरे में कागज़ के तुड़े-मुड़े ऐसे पुर्जे बिखरे थे जिन पर कुछ अश’आर लिखे हुए थे।
पूछने पर मीर ने उन पुर्जों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि भई इस बाग़ [ शे’र-शायरी ]की सैर से फ़ुरसत कहाँ
कि खिड़की खोल कर तुम्हारे बाग़ की सैर करूँ।
कहने का मतलब यह कि ज़िंदगी और शायरी दोनॊ में कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है।
सच्चा शे’र रोज़ रोज़ कहाँ होते है--महीनो में होते है।
मगर आजकल शे’र क्या 2-4 ग़ज़ल तो एक दिन में ही लोग कह डालते है लिख मारते हैं ।
प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द.पाठक ”आनन’
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