शे’र-0-शायरी 016
इस शह्रे-खराबी में ग़मे-इश्क़ के मारे
ज़िंदा हैं, यही बात बड़ी बात है प्यारे ।
-हबीब जालिब-
-----
अजीब सोच है इस शहर के मकीनों का
मकाँ नए हैं, मगर खिड़कियाँ पुरानी हैं ।
-सैयद सिब्ते अली ’सबा’-
बाक़ी अश’आर यहां सुनें--
क़िस्सा 009: किस्सा दयाशंकर ’नसीम’--तब तो एक सूरत भी थी-- बुतों की गली छोड़ कर कौन जाए यहीं से काबे को सजदा हमारा । -पण्डित दयाशं...
No comments:
Post a Comment