Friday, 11 September 2026

शायरी 016

शे’र-0-शायरी 016


इस शह्रे-खराबी में ग़मे-इश्क़ के मारे

ज़िंदा हैं, यही बात बड़ी बात है प्यारे ।

-हबीब जालिब-

-----

अजीब सोच है इस शहर के मकीनों का

मकाँ नए हैं, मगर खिड़कियाँ  पुरानी हैं ।

-सैयद सिब्ते अली ’सबा’-



बाक़ी अश’आर यहां सुनें--


 




No comments:

Post a Comment

क़िस्सा 009 : पं दयाशंकर ’नसीम’- तब तो एक सूरत भी थी--

 क़िस्सा 009: किस्सा दयाशंकर ’नसीम’--तब तो एक सूरत भी थी-- बुतों की गली छोड़ कर कौन जाए यहीं से काबे  को सजदा  हमारा । -पण्डित दयाशं...