शायरी 007
जो निक़ाबे-रुख़ उठा दी तो ये क़ैद भी लगा दी
उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे ।
-शकील बदायूनी-
[बाम तक = छत तक]
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निकल कर दैरो-काबा’ से अगर मिलता न मयख़ाना
तो ठुकराए हुए इंसाँ खुदा जाने कहाँ जाते ।
-क़तील शिफ़ाई-
ऐसे ही और चन्द मशहूर और मक़्बूल अश’आर यहाँ सुनें
प्रस्तुतकर्ता
आनन्द.पाठक’आनन’-
880092 7181
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