क़िस्सा 004: मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’ का दिलचस्प किस्सा
मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’[ 1714-1781] एक उस्ताद शायर थे। आप मीर तक़ी मीर के समकालीन थे।और दिल्ली में पैदा हुए थे। उर्दू अदब और शायरी में कसीदा तंज और हिजो लिखने / कहने के एक अच्छे शायर माने जाते हैंहाँलांकि सौदा ने मसनवी, क़सीदे, मर्सिया तर्जीहबन्द, मुख़म्मस, रुबाई, क़ता और हिजो भी लिखा है।बाद में वह अवध के नवाब के साथ फ़ैज़ाबाद आ गए थे ।
सौदा साहब बड़े गुस्सैल थे । किसी से नाराज़ हुए नहीं कि तुरन्त ’हिजो’ कहने लगते थे। मुहम्मद हुसेन आज़ाद साहब ने अपनी तारीखी किताब ’आब-ए-हयात’ में इसका ज़िक्र किया है। वह लिखते हैं कि गुंचा नाम का उनका एक नौकर था।हर समय ख़िदमत में लगा रहता था और साथ में’कलमदान भी लिए चलता था। सौदा साहब जब किसी पर बिगड़ते थे तोगुंचा को पुकारते --अरे गुंचा ! ज़रा ला तो कलमदान मैं इसकी ख़बर तो लूँ। इसने मुझे समझ क्या रख्खा है। फिर सौदा साहब वो हिजो लिखते सुनाते कि शर्म-0-हया भी शरमा जाए। सुनने वाला कान पर हाथ रख लें।फिर हिजो की तो कोई हद ही न होती थी। आलिम जाहिल फ़कीर, अमीर,नेक बद उस समय किसी की दाढ़ी उनके हाथ से न बचती।
एक बार ’फ़िदवी’ साहब [इन्ही के एक समकालीन शायर] किसी ऐसे ही मौके पर ’सौदा’ की शान में नहले पे दहला, तुर्की ब तुर्की --यह हिजो कही-यह सुनाया-
कुछ कट गई है पेटी कुछ कट गया है डोरा
दुम दाब सामने से वह उड़ गया लुटेरा
भडुआ है, मसख़रा है, सौदा उसे हुआ है।
[ अब यह न पूछिएगा कि ’हिजो’ क्या होता है]
अगर आप यह सोच रहे हैं कि इसके बाद सौदा साहब ने हिजोगोई से तौबा कर ली?
नहीं, कत्तई नहीं।
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एक बार क़यामुद्दीन साहब [ तख़ल्लुस ’उम्मीदवार ] सौदा के समकालीन] सौदा के पास शागिर्द होने आए।
तख़ल्लुस सुना तो सौदा साहब मुस्कराए और ये हिजो कही--
है फ़ैज़ से किसी के शजर उनका बारदार
इस वास्ते किया है तखल्लुस ’उम्मीदवार’।
जब औरत गर्भ से होती है तो दिल्ली की ज़बान में उसे ’उम्मीदवार’ कहते है।
फिर तो कयामुद्दीन साहब ने अपना तखल्लुस ही बदल लिया।
सौदा तो सौदा। कहाँ बाज़ आने वाले।
आदतन , एक बार एक पठान की शान में एक हिजो कही। फिर क्या था।
पठान तो पठान । सौदा की कमर पकड़ हज़ारों गालियां दीं और उन्हे वहीं पटक कर सौदा के सीने पर चढ़ बैठा।
शायद सौदा को उस दिन मालूम हुआ होगा कि हिजो कहने में क्या मजा है, क्या सज़ा है।
खैर
यह सौदा साहब के व्यक्तित्व का एक पहलू है। वरना सौदा साहब एक बेहतरीन , ज़हीन और उस्ताद शायर थे।
गम्भीर और संजीदा शायरी भी करते थे। उनका यह शे’र बहुत मशहूर है---
का’बा अगरचे टूटा तो क्या जा-ए-ग़म है शेख़!
कुछ कस्र-ए-दिल नहीं कि बनाया न जाएगा ।
यानी का’बा तो चलो एक बार टूटा तो बनाया भी जा सकता है मगर दिल अगर एक बार टूट गया तो फिर
’बनाया न जाएगा’
प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द.पाठक ’आनन’
8800927181
[स्रोत : आब-ए-हयात-[मुहम्मद हुसेन आज़ाद
औरशे’र-0-सुख़न [ अयोध्या प्रसाद गोयलीय
से साभार]
21-07-26
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