क़िस्सा 003 : मीर अनीस ---कुछ दिलचस्प बातें--
मीर बाबर अली अनीस ’अनीस’ का जन्म फ़ैज़ाबाद [उ0प्र0][ में हुआ था। वह अपने ज़माने के एक मशहूर मर्सियानिगार और मर्सियागो शायर थे। मरसिया उर्दू शायरी की एक अदबी विधा है जिसमे जिसमे कर्बला की लड़ाई का, हसन-हुसेन साहब की शान का, शहादत की दास्तान लिखी व सुनाई जाती है। अनीस साहब को इसमे महारत हासिल थी और कर्बला की दास्तान को सजीव ऐसे सुनाते थे मानो वह खुद उस जंग में शामिल थे। उन्होने मर्सिया निगारी को उच्च स्तर पर पहुँचा दिया। अनीस साहब के खानदान में लगभग सभी शे’र-0-सुख़न से बावस्ता थे।
मीर ’अनीस’ साहब ने एक बार किसी मर्सियाख़्वानी की महफ़िल में यह मिस्रा पढ़ा-
’बह्रे अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’
इस पर श्रोताओं ने शोर मचाया कि "बह्र-ए-अली" में ’ज़म’(खोट ,दोष) का पहलू निकलता है.क्योंकि "बह्र-ए-अली" तो "बहरे अली’(यानी कान से माज़ूर अली) पढ़ा या सुना जा सकता है और ज़ाहिर है कि यह बे-अदबी है.’अनीस’ ने फ़ौरन मिस्रा बदल दिया
"काने अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’
लोगों ने फ़िर शोर मचाया कि हज़रत अली "काने’(एक आँख वाले) भी नहीं थे । .घबरा कर मीर ’अनीस’ ने एक बार फिर मिस्रा बदल दिया
"गंजे अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’
[गंज़= खजाना]
लोग फिर चीख उठे कि हज़रत अली "गंजे" भी नहीं थे.मीर ’अनीस’ साहब ने एक बार फिर फ़ौरन मिस्रा बदल दिया
"कंजे़ अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’
(कंज़= खज़ाना)
और फिर इस तरह उनकी जान छूटी।
इन मिसालों से यह न समझा जाए कि हमेशा दूसरे ही "अनीस" साहब की अश’आर मुकम्मल किया करते थे .मीर ’मुनीस’ (अनीस के छोटे भाई)ने एक दिन "अनीस’को अपना शे’र सुनाया.
न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है
यूँ ही मर जाऊ ये मर्ज़ी मिरे सैयाद की है
मीर ’अनीस’ ने दूसरे मिस्रे में मामूली तरमीम (बदलाव) कर के शे’र को वो चार चाँद लगाया दिए जिस से यह शे’र ज़र्ब-ए-उल-मिसाल (लोक-मुहावरों) का दर्जा इख़्तियार कर गया
न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है
घुट-घुट कर मर जाऊ ये मर्ज़ी मिरे सैयाद की है
उस्ताद लोगों के इस्लाह भी क्या खूब होते है, काबिल-ए-तारीफ़ होते हैं।
प्रस्तुतकर्ता
आनन्द पाठक ’आनन’
8800927181
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स्रोत : इन्टर्नेट से साभार
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