Thursday, 16 July 2026

क़िस्त 006 : क़िस्सा 001 का परिशिष्टांक

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किस्सा 001 का परिशिष्ट ं अंक---

मित्रों किस्सा 001 में मिर्जा इंशा अल्लाह ख़ाँ ’इंशा’ और मिर्ज़ा अज़ीम बेग ’अज़ीम’ साहब का एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाया था जो इसी ब्लाग पर उपल्ब्ध है।
https://akp317.blogspot.com/2026/07/001.html

क़िस्सा को मुख़्तसर [संक्षेप] करने के लिए बहुत सी संबद्ध बातें वहाँ नहीं लिखी।

मेरे एक मित्र विवेक नारायण जी ने वह अतिरिक्त बातें मुझसे साझा की। वह सब बाते आप लोगों की जानकारी व सुविधा के लिए यहाँ लगा रहा हूँ ताकि सनद रहे।

क़िस्सा 001 में इंशा के जिस मुखम्मस का जिक्र हुआ है और जिसे इंशा ने उस मुशायरे में तंजन पढ़ा था ,वह यूँ था--


र तू मुशाइरे में सबा आज-कल चले

कहियो "अज़ीम" से कि ज़रा वो संभल चले

इतना भी हद से अपनी न बाहर निकल चले

पढ़ने को शब जो यार ग़ज़ल दर ग़ज़ल चले

बह्र-ए-रजज़ में डाल कर बह्र-ए-रमल चले


- मिर्ज़ा इंशा अल्लाह खान "इंशा"

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और इसके जवाब में अज़ीम साहब ने  इसी ज़मीन पर जो मुखम्मस पढ़ा था ,वह यह था--

1.

वो फ़ाज़िल-ए-ज़माना हो तुम साहिब-ए-उलूम

तैहसील-ए-सर्फ़-ओ-नह्व से जिन की मची है धूम

रमल-ओ-रियाज़ी, हिकमत-ओ-है'अत, जफ़र, नुजूम

मंतिक, बयाँ, मआनी कहें सब ज़मीं को चूम

तेरी ज़बाँ के आगे न दहकां का हल चले


2.

इक दो ग़ज़ल के कहने से बन बैठे ऐसे ताक़

दीवान शा'इरों की नज़र से रहे ब-ताक़

नासिर अली नज़ीरी की ताक़त हुई है ताक़

हर चंद अभी ना आई है फ़हमीद-ए-जुफ़्त-ओ-ताक़

टंगड़ी तले से उर्फ़ी ओ क़ुदसी निकल चले


3.

था रोज़ फ़िक्र में के कहूँ म'अनी ओ मिसाल

तजनीस ओ हम-रिआयत ए लफ़ज़ी व हम-ख़याल

फ़र्क़-ए-रजज़ रमल न लिया मैंने गो संभाल

नादानी का मिरे न हो दाना को एहतिमाल

गो तुम ब-क़द्र-ए-फ़िक्र यही कर हमल चले


4.

नज़दीक अपने आप को कितना ही समझो दूर

पर खूब जानते हैं मुझे जो हैं ज़ी-शुऊर

वो बहर कौन सी है नहीं जिस पे याँ उबूर

कब मेरी शाइरी में पड़े शुबह से क़ुसूर

बन कर क़ुमल निकालने को तुम ख़लल चले


5.

मौज़ूनी-ओ-मआनी में पाया न तुमने फ़र्क़

तबदील-ए-बह् र से हुए बह्र-ए-ख़ुशी में ग़र्क़

रौशन है मिस्ल-ए-मिह्र ये अज़ ग़र्ब ता ब शर्क़

शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़

वोह तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले ।


6.

कम-ज़र्फ़ी से तुम्हें तो यही आई है उमंग

कीजे नुमूद-ए-ख़ल्क़ में अब कर सुख़न की जंग

अपने तईं तो बहसने में आता है यार-ए-नंग

इतना भी रखिये हौसला फव्वारा सा ना तंग

चुल्लू ही भर जो पानी में गज़ भर उछल चले


7.

क्यूँ जंग-ए-गुफ्तगू को तुम उठ दौड़े इस क़िमाश

करते जो भारी पाइंचा होता नाः परदाः फ़ाश

पर समझें कब ये बात जो कुंदे हों ना-तराश

तेग़-ए-ज़बाँ को म्यान में रखते तुम अपने काश

नाहक़ जो तुम अज़ार से बाहर निकल चले


-अज़ीम बेग ’अज़ीम- 

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शब्दार्थ __

1.

फ़ाज़िल = जिस ने सारी विद्या पढ़ ली हो, फ़ारिगुत्तहसील

उलूम = इल्म का बहुवचन, विद्याएं, बहुत सा ज्ञान

तह् सील = हासिल करना, उपार्जन, एकत्र करना

सर्फ़ = व्याकरण की एक शाखा, पद-व्याख्या

नह्व = व्याकरण की वह शाखा जिसमें वाक्यों के परस्पर सम्बन्ध और शब्दों की स्थिति जानी जाती है

सर्फ़ ओ नह्व = व्याकरण, क़वाइद, पद-व्याख्या

रमल = भविष्य में होने वाली घटनाओं को जानने की विद्या, इसका मूल आधार बिंदी और शून्य होते हैं

रियाज़ी = गणित, इल्मुल-हिसाब,

हिकमत = विज्ञान, science, आयुर्वेद, तिब(ब्ब)

है'अत = खगोल शास्त्र

नुजूम = ज्योतिष शास्त्र

मंतिक़ = तर्क शास्त्र, logic

बयाँ = साहित्य, अलंकार

मआनी = मा'ना का बहुवचन, अर्थ-समूह

देहक़ान/देहक़ाँ = किसान

2.

ताक़ (1st line) = दक्ष, निपुण, चतुर

ताक़ (2nd line) = दीवार में बना हुआ छोटा मेहराबदार ख़ोल, आला, मोखला/मोखल

ब-ताक़ = ताक़ में रखा हुआ

ताक़ (3rd line) = समाप्त होना (इस अर्थ में सिर्फ 'ताक़त' शब्द के साथ इस्तेमाल होता है), शक्ति-समाप्त

फ़ह् मीद/फ़हमीद = समझ, बुद्धि, विवेक

जुफ़्त = जोड़ा, pair, सम संख्या, even number, जैसे 2, 4, 6, 8

ताक़ (4th line) = विषम संख्या, odd number, जैसे 3, 5, 7, 9

दिलचस्प बात ये है कि 'ताक़' शब्द के ये सभी मानी लुग़त/ शब्दकोश में मौजूद हैं

नासिर अली नज़ीरी, उर्फ़ी और क़ुदसी फ़ार्सी के बड़े शायरों के नाम हैं

3.

म'अनी = अर्थ-गर्भित

मिसाल = आदर्श, नमूने का

तजनीस = एकरूपता, हमशक्ली,; एक शब्दालंकार जिसमें किसी शेर में एक जैसे शब्द लाये जाते हैं, यमक

रिआयत = व्यवहार में कोमलता; मूल्य में कमी; विचार, ध्यान, ख़याल

हम-रिआयत = रिआयत के साथ

रजज़ = (युद्धक्षेत्र में अपने कुल की शूरता और श्रेष्ठता का वर्णन) यहां बह्रे-रजज़ से आशय है

दाना = बुद्धिमान, कुशल

एहतिमाल = शंका करना, संदेह

हमल/हम्ल = बोझ उठाना, भार (गर्भ और पेट भी इस शब्द के अर्थ है

4.

दूर = अंतर पर, फ़ासिले पर, पृथक, अलग, जुदा

ज़ी = एक उपसर्ग जो संज्ञा के पहले आकर "वाला" का अर्थ देता है, जैसे :- ज़ीअक़्ल = अक़्ल वाला

शुऊर = शिष्टता, सलीक़ा

बहर/ बह्र = शेर का वज़न/वज़् न

उबूर = नदी आदि को पार करना, पार उतरना

क़ुमल = जूं, lice

ख़लल = दरार, crack, विघ्न, बाधा, अड़चन

5.

मौज़ूँ = उचित, मुनासिब; योग्य,लायक़; यथोचित, वाजिब, संतुलित, वह शेर जिसका वज़्न ठीक हो

मौज़ूनी = मौज़ूनियत = मौज़ूँ होने का भाव, औचित्य, मुनासबत, योग्यता, क़ाबिलीयत

मिह्र = सूरज, सूर्य

मिस्ल ए मिह्र = सूरज के समान

अज़ = से

ग़र्ब = पश्चिम

शर्क़ = पूरब

अज़ ग़र्ब ता ब शर्क़ = पश्चिम से पूरब तक

6.

कमज़र्फ़ी = ओछापन; अनुदारता

नुमूद = आविर्भाव, ज़ुहूर; धूम-धाम, तड़क-भड़क; ख्याति, शोहरत; उगना, प्राकट्य, अस्तित्व, हस्ती, प्रकाशित

ख़ल्क़ = जनता, अवाम,

नंग = लज्जा, शर्म; दोष, आर


[सौजन्य से --आ0 विवेक नारायण जी]

प्रस्तुत कर्ता

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

दिनांक 17-07-26

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