Wednesday, 15 July 2026

क़िस्त 005: शायरी 002

क़िस्त 005: शायरी 002

:1: 

बग़ैर पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है ,

नहीं भी हो, तो भी मुजरिम दिखाई देता है।

-सुरेश चन्द्र ’शौक़’-

:2: 

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था ,

हमी सो गए दास्तां  कहते कहते ।

-साकिब लखनवी -

:3: 

भाँप ही लेंगे, इशारा सरे महफ़िल जो किया

ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं ।

-माधव राम ”जौहर’

:4:

दीवार-ए-चमन पर ज़ाग़-ओ-ज़गन

मसरूफ़ हैं नौहाख़्वानी में ’

हर शाख में उल्लू बैठा है

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा ।

[ ज़ाग-ओ-ज़गन = चील कौआ]

[ नौहाख़्वानी में = रोने धोने में ]

-क़माल सालारपूरी-

:5:

गए दोनों ज़हान के काम से हम,न इधर के रहे,न उधर के रहे ।

न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनमनन इधर के रहे ,न उधर के रहे ।

-मिर्ज़ा सादिक़ ’शरर’

:6:

रात की बात का मज़्कूर ही क्या ,

छोड़िए रात गई, बात गई ।

-चिराग़ हसन ’हसरत’

:7:

सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ

ज़िंदगी गर कुछ रही तो, ये जवानी फिर कहाँ ।

-ख़्वाज़ा मीर ’दर्द’-

000-000-000

प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द पाठक ’आनन’
8800927181
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