क़िस्त 005: शायरी 002
:1:
बग़ैर पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है ,
नहीं भी हो, तो भी मुजरिम दिखाई देता है।
-सुरेश चन्द्र ’शौक़’-
:2:
ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था ,
हमी सो गए दास्तां कहते कहते ।
-साकिब लखनवी -
:3:
भाँप ही लेंगे, इशारा सरे महफ़िल जो किया
ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं ।
-माधव राम ”जौहर’
:4:
दीवार-ए-चमन पर ज़ाग़-ओ-ज़गन
मसरूफ़ हैं नौहाख़्वानी में ’
हर शाख में उल्लू बैठा है
अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा ।
[ ज़ाग-ओ-ज़गन = चील कौआ]
[ नौहाख़्वानी में = रोने धोने में ]
-क़माल सालारपूरी-
:5:
गए दोनों ज़हान के काम से हम,न इधर के रहे,न उधर के रहे ।
न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनमनन इधर के रहे ,न उधर के रहे ।
-मिर्ज़ा सादिक़ ’शरर’
:6:
रात की बात का मज़्कूर ही क्या ,
छोड़िए रात गई, बात गई ।
-चिराग़ हसन ’हसरत’
:7:
सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो, ये जवानी फिर कहाँ ।
-ख़्वाज़ा मीर ’दर्द’-
000-000-000
प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द पाठक ’आनन’
8800927181
Visit my YouTube channel
आवाज़ का सफ़र
शे’र-0-शायरी
इन अश’आर को आप यहाँ सुन सकते हैं--
No comments:
Post a Comment