क़िस्त 007 : शायरी 003
ऐसे बरमहल [ मौक़े मुताबिक़] अश’आर आप ने बातचीत के दौरान ज़रूर सुने होंगे
लोग अपने अपने हाफ़िज़ा के मुताबिकं [ याददास्त के अनुसार ] सुनाते रहते है।
ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है -
मुर्दा दिल ख़ाक जिया करते हैं !
-इमाम बख़्श नासिख़-
तू इधर उधर की न बात कर, यह बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा ,
हमे रहजनों से गिला नहीं , तेरी रहबरी का सवाल है ।
-शहाब जाफ़री -
ऐसे ही अन्य अश’आर आप यहाँ सुनें--
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आवाज़ का सफ़र
आवाज़ का सफ़र
-आनन्द पाठक ’आनन’-
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