Thursday, 16 July 2026

क़िस्त 007 : शायरी 003

 क़िस्त 007 : शायरी 003

ऐसे बरमहल [ मौक़े मुताबिक़] अश’आर आप ने  बातचीत के दौरान ज़रूर  सुने होंगे
लोग अपने अपने हाफ़िज़ा के मुताबिकं  [ याददास्त के अनुसार ] सुनाते रहते है।


ज़िंदगी ज़िंदादिली  का नाम है -

मुर्दा दिल ख़ाक जिया करते हैं !

-इमाम बख़्श नासिख़-


तू इधर उधर की न बात कर, यह बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा ,

हमे रहजनों से गिला नहीं , तेरी रहबरी  का सवाल  है ।

-शहाब जाफ़री -

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-आनन्द पाठक ’आनन’-

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