क़िस्त 009 : शायरी 005
जिसके आँगन में अमीरी का शजर लगता है
उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है ।
-अंजुम रहबर-
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे
कि दाना ख़ाक में मिल कर गुले-गुलज़ार होता है ।
-इक़बाल-
ऐसे ही शे’र जो हर आम-ओ-ख़ास के ज़ुबान पर
रहते हैं मौक़े दर मौक़े बोले व पढ़े जाते हैं ,लोकप्रिय
मक़्बूल है-
-यहाँ सुनें
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