Sunday, 19 July 2026

शायरी 005

क़िस्त 009 : शायरी 005

 

जिसके आँगन में अमीरी का शजर लगता है

उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

-अंजुम रहबर-


 मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे

कि दाना ख़ाक में मिल कर गुले-गुलज़ार होता है ।

-इक़बाल-

ऐसे ही शे’र जो हर आम-ओ-ख़ास के ज़ुबान पर

रहते हैं मौक़े दर मौक़े बोले व पढ़े जाते हैं ,लोकप्रिय

मक़्बूल है-

-यहाँ सुनें




 

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