एक चर्चा : "तू इधर उधर की न बात कर--
तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे
तेरी रहबरी का सवाल है, मुझे राहज़न से ग़रज़ नहीं ।
दर अस्ल यह शे’र "शहाब ज़ाफ़री" साहब का है।
सैय्यद वक़ार अहमद शहाब ज़ाफ़री साहब की पैदाईश जौनपुर [उ0प्र0] में हुई थी।
आजकल इस शे’र के कई रूप और कई वर्जन मिलते है। यह शे’र इतना मानीखेज़ [अर्थ पूर्ण] है कि लोग बाग मौक़े दर मौकेअपने अपने हिसाब से पढ़ते, सुनाते रहते हैं।
कहते हैं यह शे’र सबसे पहले पार्लियामेन्ट में मौलाना आज़ाद साहब ने जवाहर लाल नेहरू जी को संबोधित कर के पढ़ा था। उस वक्त ज़ाफ़री साहब की उम्र71-साल की थी। सुषमा स्वराज जी ने भी यह शे’र एक बार संसद में किसी मौक़े पर पढ़ा था। अब तो नेतागण प्राय:मौक़े दर मौक़े समय समय पर संसद में. विधान सभा मे, टी0वी0 बहस मे पढ़ते रहते है जब किसी को कटघरे में खड़ा करना होता है। ख़ैर , सिद्धू साहब तो कई बार बेमौक़े भी पढ़ देते हैं और अन्त में कहते हैं--ठोंको ताली।
ऐसे शे’र जब इतने मशहूर और मक़्बूल हो जाते है तब समय के अन्तराल पर इसके रूप मे कुछ बदलाव भी आ जाता है, विकॄति आ जाती है । जैसे
इसका एक रूप यह भी है-आप ने भी सुना होगा---
तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा
तेरी रहबरी का सवाल है, मुझे राहज़न से ग़रज़ नहीं ।
यानी काफ़िले की जगह --काफ़िला --[एकवचन]
या फ़िर
तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा
मुझे रहजनों से गिला नहीं ,तेरी रहबरी का सवाल है ।
यानी
राहज़न की जगह--- रहज़नों--
ग़रज़ [12] की जगह -गिला-[12]
और तो और मिसरा सानी को ही उलट दिया --यानी जिसको जिसमे सुविधा होती है --अपने हिसाब से इस शे’र को पढ़ता है।
आप ने अगर इस शे’र का कोई और version सुना हो तो ज़रूर बताइएगा।
बात जो भी हो शे’र का मफ़हूम बहुत साफ़ है--मानूस है--लोकप्रिय है।
अन्त में --शे’र वही जो जन जन को भावे--
प्रस्तुत कर्ता
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
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