क़िस्सा 005 :सैय्यद मुहम्मद मीर ’सोज़’ --एक दिलचस्प क़िस्सा
सैय्यद मुहम्मद मीर साहब, मीर तक़ी मीर के ज़माने के शायर थे या यह कहें कि
समकालीन शायर थे। मुहम्मद मीर साहब, शुरु शुरु में अपना ’तख़ल्लुस ’मीर’ ही रखा था
लेकिन जब उन्होने देखा कि मीर तक़ी मीर का भी तख़ल्लुस ’मीर’ ही है तो उन्होने अपना
उपनाम बदल कर-सोज़-रख लिया।
सोज़ साहब दिल्ली में पैदा हुए थे और अन्त में लखनऊ आ गए नवाब आसुफ़द्दौला के उस्ताद हो गए।
सोज़ साहब एक ज़हीन शायर थे। उनकी ज़बान मीठी ज़बान थी, मुहावरेवाली ज़बान थी ।
उन्होने कई मशहूर शे’र कहें हैं--उदाहरण स्वरूप 1-2 शे’र यहाँ लिख रहा हूँ
तड़पती क्यों हैं ऎ बुलबुल ! कमाल इतना तो पैदा कर
कि तेरा अश्क जिस जा गिर पड़े गुलज़ार पैदा हो ।
[ जा= जगह]
या
जिसको नित देखते थे अब उनका
देखना ही अब ख़याल-ओ-ख़्वाब हुआ।
कहते है--
सोज़ साहब का ग़ज़ल पढ़ने का अन्दाज़ भी ख़ूब था । हर शायर का अगर अपना
अन्दाज़-ए-बयाँ होता है तो अन्दाज़-ए-ग़ज़लगोई भी होता है। लखनऊ के आदिल साहब का
अन्दाज़ आप ने देखा होगा जब वो अपनी मज़म -आदमी को अगर पूँछ होती--पढ़ते है
या राहत इन्दौरी का अन्दाज़ आप ने देखा होगा लगता है कि वह आसमान से कोई शे’र खॊंच
कर लाते है और श्रोताओं के सामने उछाल देते हैं। ख़ैर अन्दाज़ अपना अपना।
सोज़ साहब के पढ़ने का भी अन्दाज़ निराला था। तरन्नुम में पढते थे और इस तरह से हाव भाव प्रदर्शित करते थे
इस अदा से बल खा कर पढ़ते थे कि लगता था कि वह खुद ही मज़मून की सूरत बन गए -ग़ज़ल के
पैकर में घुस गए।
जब उन्होने एक क़िता पढ़ा-
गए घर से जो हम अपने सबेरे
सलाम अल्लाहख़ाँ साहब के डेरे
वहाँ देखे कई तिफ़्ले-परीरू
अरे रे-रे अरे रे-रे अरे-रे ।
[तिफ़्ले-परीरू = कमसिन हसीन सुंदरियाँ]
चौथा मिसरा इस अन्दाज़ से पढ़ा कि पढ़ते पढ़ते ज़मीन पर गिर पड़े जैसे उन हसीन कमसिन सुंदरियों को देखते
दिल बेकाबू हो गया
होता भी क्यों न !
शायर आदमी जो थे।
प्रस्तुतकर्ता
आनन्द.पाठक ’आनन’
8800927181
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