क़िस्सा 010 : नासिख़ और आतिश साहब का
सियहबख़्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा रहता है इन्साँ से ।
-नासिख़ -
यह नासिख़ साहब का शे’र है जिसका सीधा अर्थ है कि दुर्दिन दिन में कोई किसी का साथ नहीं देता
यहाँ तक कि अँधेरे में ,दिन भर साथ रहने वाला अपना साया [अपनी छाया] भी साथ छोड़ देता है।
नासिख़ का पूरा नाम -शेख़ इमाम बख़्श था और फ़ैज़ाबाद [उ0प्र0] के खुदाबख़्श ख़ेमादोज़ के दत्तक पुत्र थे।
नासिख अपने ज़माने के मशहूर उस्ताद शायर थे और उनके बहुत से शागिर्द भी थे। नासिख को पहलवानी का शौक़ था ।डील डौल भी अच्छा ख़ासा लम्बा चौड़ा था।
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यह शे’र
बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-खूँ न निकला।
-आतिश -
यह शे’र आतिश साहब का है। आतिश का पूरा नाम ख़्वाज़ा हैदर अली था और इनका भी जन्म फ़ैज़ाबाद [उ0प्र0] में हुआ था ।
एक बात और -
हिन्दुस्तान में उर्दू शायरी के मुख्यत: 3- स्कूल माने जाते हैं--
-हैदराबाद स्कूल [दख्खिनी]
-दिल्ली स्कूल
-लखनऊ स्कूल ।
इन स्कूलों पर कभी विस्तार से बाद में चर्चा करेंगे। यहाँ बस इतना ही जान लीजिए कि इन स्कूलों के शायरों के शे’र-ओ-सुखन
के रंग ,मिज़ाज, अलग अलग थे अलहदा थे मुख्तरिफ़ थे।
नासिख और आतिश -लखनऊ स्कूल के शायर तो थे मगर उनके शे’र-0-सुखन के रंग-0-मिज़ाज ्बिलकुल भिन्न था मुख्तलिफ़ था। नासिख और आतिश हमअस्र [ समकालीन] भी थे और आपस में नोक-झोंक भी चलती थी मगर शायराना और अदबी अंदाज में और तमीज-0-तहजीब में रह कर, मर्यादा में रह कर। समझने वाले समझ जाते थे।
एक बार नासिख एक मुशायरे में इतने विलम्ब से पहुँचे कि मुशायरा लगभग समाप्त हो चुका था, लोग जा चुके थे। आतिश और उनके शागिर्द बस चलने वाले ही थे कि नासिख साहब को देखते ही सब ठहर गए और बड़े सम्मान और अदब से एक ग़ज़ल सुनाने का अनुरोध किया।
नासिख ने बात रखने के लिए अपनी ग़ज़ल का एक मतला पढ़ा--
वो ख़ास हैं, वो शरीके-गिरोहे-आम नहीं
शुमार दान-ए-तस्बीह में ’इमाम’ नहीं ।---[नासिख]
मतला सुनते ही आतिश के शागिर्द सब बेचैन हो उठे कि जनाब अपने आप को ख़ास बता रहे हैं।
नासिख ने मतले के ज़रिए उन पर बज़ाहिर चोट भी की थी। यानी जिस तरह तस्बीह [ जप माला ] में ऊपर के 3-दाने , माला के अन्य आम दानों में शुमार नही होते बल्कि आला हैसियत, आला मुकाम रखते है ये दाने इमाम दाने की हैसियत रखते है --वो आम [साधारण] दाने में शुमार नहीं होते। उसी तरह यह नासिख भी इतने आम [साधारण शायर] नहीं कि मुशायरे में पहले आ कर गिरोह में बैठे। चूंकि नासिख़ साहब का पूरा नाम -शेख़ इमाम बख़्श था तो मतले में ’इमाम
शब्द लाकर इमाम शब्द के दो-मानी का मज़ा दिया था।
ग़ज़ल खत्म होने पर आतिश के एक शागिर्द ने तुरन्त फ़िलबदीह एक मतला तुर्की ब तुर्की बना कर सुना दिया--
यह बज़्म वो है कि ताख़ीर का गुलाम नहीं
हमारे गंजिफ़: में बाजिए गुलाम नहीं ।
[ताख़ीर का = विलम्ब का, देरी का]
[गंजफ़: में : ताश के खेल में]
मतलब यह कि ये मुशायरा किसी के विलम्ब से आने का मुकाम नही है ,स्थान नहीं है।
हम लोगो के ताश के इस खेल में किसी गुलाम की कोई बाजी भी नही, किसी गुलाम का काम भी नहीं।
चूंकि नासिख, ख़ुदाबख़्श ख़ैमादोज़ के दत्तक पुत्र थे और उनके पट्टीदारों ने नासिख को खुदा बख्श का दत्तक पुत्र नही बल्कि ख़ुदा बख़्श का गुलाम कहते थे गुलाम मानते थे । शागिर्द ने मतला में गुलाम शब्द का प्रयोग कर कमाल कर दिया
उसका इशारा उसी जानिब था ।
शागिर्द तो शागिर्द -उस्ताद तो उस्ताद। नासिख साहब ने तुरन्त इस मतले का तुर्की ब तुर्की जवाब दिया कि लाजवाब कर दिया।
नासिख साहब नें मतला पढ़ा--
जो ख़ास बन्दे है वो बन्दा-ए-अवाम नहीं
हज़ार बार जो "यूसुफ़" बिके, गुलाम नहीं ।
आप लोग इस्लामी कहानियों में -’युसुफ़’[ अलैहिस्सलाम ] -की कहानी ज़रूर जानते होंगे । जो नही जानते हैं -वो यू-ट्यूब, गूगल, इन्टर्नेट पर
देख सकते हैं। पढ़ सकते हैं सुन सकते हैं। खैर
युसुफ़ [अलै0] तो पैगम्बर थे। वो मिस्र के बाज़ारों में गुलामों के साथ बेचे गए और गुलामॊ की तरह उन्हे ख़रीदा गया। मगर वह गुलाम नहीं कहलाए।
पैगम्बर ही कहलाए।
वाह क्या जवाब दिया नासिख साहब ने आतिश साहब के उस शागिर्द को। वाह।
इसीलिए तो कहते है उस्ताद ,उस्ताद ही होते हैं।
एक बात और
ख़ुदा का शुक्र है कि उस ज़माने में फ़ेसबुक और ह्वाटसअप नहीं हुआ करता था वरना --तो यह नोंक झोंक कहाँ तक जाती- नुक़्त-ए-दौर-ए हाज़िर में जनाब जनाब से शुरु हो कर तू तड़ाक तू तू मैं मैं तक । -खुदा ख़ैर करे।
प्रस्तुतकर्ता-
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
[अयोध्या प्रसाद गोयलीय जी की किताब [-शे’र-0-सुखन भाग-1] से आभार]
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