रविवार, 11 अक्टूबर 2026

किस्सा 011 : मिर्ज़ा ग़ालिब का--

 किस्सा 011 : मिर्ज़ा ग़ालिब का --

जो शे’र-0-शायरी से ज़ौक़-0-शौक़ फ़रमाते हैं वो ’ग़ालिब’ को ज़रूर जानते होंगे । कौन है जो ग़ालिब को नहीं
जानता ? जो नहीं जानते हैं उनके लिए ग़ालिब साहब पहले ही एक शे’र लिख कर छोड़ गए है--
पूछते हैं वो कि ’ग़ालिब’ कौन है ?
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या ?
चलिए थोड़ा-सा संक्षेप में बता देते हैं। ग़ालिब का पूरा नाम -मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ था।
इनका जन्म 27-दिसम्बर 1797 आगरा में हुआ था। पहले वह
’असद’ तख़ल्लुस से शायरी करते थे, बाद में वह ’ग़ालिब’ के नाम
से मशहूर हुए। आप ज़ौक़ , मोमिन के हमअस्र [ समकालीन] थे और ये सभी उस ज़माने के उस्ताद और मशहूर शायर थे । इनकी मृत्यु 15-फ़रवरी-1869 को हो गई।]
वैसे ग़ालिब साहब के बाबत तो कई किस्से मशहूर है। आज यहाँ उनके एक किस्से की चर्चा करते हैं।
शायद आप लोगों ने यह किस्सा पढ़ा या सुना होगा। ख़ैर।
हर शायर का [ या साहित्यकार का] अपना एक ख़ास मिज़ाज होता है और उसी मिज़ाज के साथ ज़िंदगी भर जीता है।
ग़ालिब साहब भी उसी मिज़ाज के साथ जिए। ग़ालिब साहब बड़े स्वाभिमानी थे ,ग़ैरत मंद थे। अड़ गए तो अड़ गए। नकार दिया तो नकार दिया।
मगर अपनी ग़ैरत से समझौता नहीं करते थे। जब कि उनकी तंगदस्ती आर्थिक विपन्नता हमेशा उनके साथ रही । इस पर एक किस्सा कभी बाद में सुनाएँगे।
ख़ैर
1852 में एक बार ग़ालिब साहब को नौकरी का आफ़र मिला। दिल्ली कालेज में फ़ारसी के शिक्षक का। आर्थिक संकट तो था ही। ग़ालिब साहब ने यह ’आफ़र’ स्वीकार कर लिया।
कोई टामसन साहब उन दिनों Govt of India के secretary थे। उन्होने ग़ालिब को मिलने के लिए बुलावा भेजा। ग़ालिब साहब पालकी में बैठ
कर टामसन साहब से मिलने उनके बंगले पर पहुँच गए और अंदर संदेश भिजवा कर, बाहर इन्तिज़ार करने लग गए पर टामसन साहब काफ़ी देर तक बाहर मिलने के लिए न आए। ग़ालिब साहब को यह इन्तिज़ार नागवार गुज़रा, गैरत पर चोट पहुँचीं
उन्होने तुरन्त कहारों को आदेश दिया कि पालकी वापस ले चलो।
जब टामसन साहब को यह बात पता चली तो फ़ौरन बाहर आए और ग़ालिब को समझाने लगे--जनाब इस वक़्त आप कोई ख़ास मुलाक़ाती तो
हैं नहीं -कि मैं बाहर आ कर आप का स्वागत करता-आप नौकरी के लिए आए हैं--
ग़ालिब साहब इस दलील से संतुष्ट नहीं हुए । पलट कर जवाब दिया--
"जनाब-ए-आली ! अगर नौकरी का मतलब यह है कि इससे इज्जत में कमी आ जाए तो मुझे ऐसी नौकरी मंज़ूर नहीं।:
ग़ालिब साहब ने आदाब बजाया और पालकी में सवार हो कर वापस आ गए।
क्या थे ग़ालिब साहब , क्या वो ज़माना।
एक सवाल--
ग़ालिब साहब को दिल्ली वाले ’नौशा’ क्यों कहते थे।
प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181
To visit my channel CLICK the Link below
www.youtube.com/@03akp

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

शायरी 020

 शे’र-0-शायरी 020

अब्रू न सँवारा करो, कट जाएगी उँगली
नादान हो तलवार से खेला नहीं  करते ।  
  
-आग़ा जफ़र बेग क़जलबाश-

[अब्रू = भौहें]

------

दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की
यारों ने मेरे सहन में रस्ते बना लिए ।

-सिब्ते अली ’सबा’-




गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

सूचना : मेरे यू-ट्यूब चैनेल के बारे में--

  सूचना- मेरे ’यू-ट्यूब’- चैनेल के बारे में

मित्रो! मैने अपनी रचनाओ को प्रकाशित करनेके लिए , अपने कुछ youtube channel बनाएँ हैं---
1- गीत ग़ज़ल माहिया अनुभूतियाँ के लिए  --आवाज़ का सफ़र --इन्हेंआप यहाँ सुन सकते है- Click the Link www.youtube.com/@33akp
2-अपनी व्यंग्य रचनाओं के लिए - मुखौटों_की_दुनिया- इन्हें आप यहाँ सुन सकते है
Click the Link www.youtube.com/@333akp
3-शे’र-0-शायरी , शे’र-0-सुखन,. शायरॊ के दिलचस्प किस्से, शायरी के बह्र पर चर्चा आदि के लिए- शे’र-0-शायरी
इन्हे आप यहाँ सुन सकते हैं-
-Click the Link www.youtube.com/@03akp इन चैनेलों को आप ने अबतक SUBSCRIBE न किया हो तो कर दें और SHARE भी कर दें

किस्सा 011 : मिर्ज़ा ग़ालिब का--

  किस्सा 011 : मिर्ज़ा ग़ालिब का -- जो शे’र-0-शायरी से ज़ौक़-0-शौक़ फ़रमाते हैं वो ’ग़ालिब’ को ज़रूर जानते होंगे । कौन है जो ग़ालिब को नहीं जानता ? ज...