किस्सा 007 : ज़फ़र गोरखपुरी साहब का एक दिलचस्प किस्सा
देखें क़रीब से तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे ।
यह शे’र "ज़फ़र गोरखपुरी" साहब का है। आप का पूरा नाम ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र था और आप तहसील बाँसगाँव, जिला गोरखपुर में 1935 में पैदा हुए थे। आप अपने समय के एक उम्दा और ज़हीन शायर थे। आप ने बम्बई [मुम्बई] में हिंदी फ़िल्मों में कुछ गीत भी लिखे मगर कोई ख़ास कामयाबी न मिली।
इनके कुछ शे’र बड़े मशहूर हुए। 1-2 बानगी देखें--
ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे
ये सब थे भीख मेरे साथ माँगने वाले।
या यह फिर-
कितनी आसानी से मशहूर किया है ख़ुद को
मैने अपने से बड़े शख़्स को गाली दी है।
देखिए एक शायर कितना दूर का सोचता है। उक्त शे’र का अमल हाल ही में काकरोच पार्टी के ’ज़ेन-जी’ वालों ने बेझिझक खुल्लम खुल्ला किया जो आप सब जानते ही है। अगर मशहूर होने का यही रास्ता है तो तौबा तौबा।
ख़ैर
खलीक़ुज़्ज़मा ’नुसरत’ साहब ने ज़फ़र साहब का एक दिलचस्प किस्सा अपनी किताब ; बरम्हल अश’आर/ ज़बानज़द अश’आर में बयान किया है । आप ने ऊपर भीख मांगने वाला शेर सुना। एक ऐसा ही शे’र उनका और है।
किस्सा कोताह यह कि --
ज़फ़र साहब एक मुशायरे में अपना एक शे’र--
अब भीख माँगने के तरीक़े बदल गए
लाज़िम नहीं की हाथ में कासा दिखाई दे।
[कासा = भिक्षा पात्र, भीख माँगने का कटोरा]
यह शे’र उपस्थित श्रोताओं को इतना अच्छा लगा कि मुकर्रर मुकर्र कहने लगे वाह वाह करने लगे और ज़फ़र साहब से यही शे’र बार बार पढ़वा रहे थे। एक सज्जन अपनी कार में बैठे यह शे’र सुन रहे थे। उन्हे भी यह शे;र इतना पसन्द आया कि अपनी कार से उतर कर सीधे स्टेज पर गए और ज़फ़र साहब को 10/- का नोट थमा दिया ।
फिर क्या था। पूरी महफ़िल में हँसी का फ़ौव्वारा छूट गया।
कभी कभी मुशायरे/महफ़िल में ऐसी घट्ना हो जाती है कि पूरा माहौल ही बदल जाता है।
प्रस्तुत कर्ता
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
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