मंगलवार, 22 सितंबर 2026

चर्चा 008 : वा’दा -इरादा- जैसे क़ाफ़िया -पर एक चर्चा


चर्चा 008 : वा’दा -इरादा- जैसे क़ाफ़िया -पर एक चर्चा


किसी मंच पर मेरे एक मित्र ने परवीन शाकिर का एक मतला लिखा--


उसने भी लौटने का इरादा नही किया

हमने भी भूल जाने का वा’अद: नहीं किया।---परवीन शाकिर


और सवाल किया कि मतले का क़ाफ़िया क्या ठीक है?

मेरे एक अन्य मित्र ने क़ाफ़िया [और इस ग़ज़ल के दिगर कवाफ़ी--

यानी लबादा--बादा--ज़ियादा--सादा-- वग़ैरह] को दुरुस्त ठहराया।

मेरे मित्र का सवाल था क्यों और कैसे?

आज की चर्चा इसी सवाल पर।

---

इक़बाल साहब का एक शे’र है=--


ख़ामोश ऎ दिल! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा

अदब पहला क़रीना है , मुहब्बत के क़रीनों में ।‘-अल्लामा इक़बाल

[इस ग़ज़ल की बह्र है -1222---1222--1222--1222]


यानी -क़री्ना और क़रीनो- दोनों का वज़न -122- है।

साथ ही कुछ और दीगर शब्द ख़याल में रखें जैसे--पर्दा--परवाना --आदि।

ये सभी शब्द [और ऐसे हज़ारो शब्द [उर्दू-अरबी-फ़ारसी में ] के इमला में

आख़िरी हर्फ़ हा-ए-हूज़ [छोटॊ -हे-यानी गोल -हे-आती है} से लिखे जाते हैं।


[मैं यहाँ --उर्दू हा-ए-हुत्ती[ बड़ी हे] --हा-ए- हूज़ , हा-ए-हूज़ की कितनी किस्में होती हैं हा-ए-मल्फ़ूज़ी--हा-ए-मख्फ़ूफ़ी--दो चश्मी हे-आदि , इनके शब्द पर क्या असरात होते हैं--discuss -नहीं करूँगा -ये उर्दू व्याकरण का विषय है और विस्तार में यहां discuss करने से विषय बोझिल और दुरूह हो जाएगा]

संक्षेप में आप यह समझ लें--

[क[-- जिस लफ़्ज़ के आखिर में हा-ए-हूज़ [ छोटी हे] लगी हो वो अपने पहले आने वाले हर्फ़ को मुतहर्रिक[1] कर देता है।

जैसे वा’दा = बा’द: [21]

पर्दा = पर्द: [21]

परवाना= परवान: [21]

क़रीना = क़रीन: [21]

[ख] -हा-ए-हूज़ की आवाज़ कुछ कुछ -अलिफ़ की आवाज़- के समान होता है । अगर इस को खींच कर [तवील कर] पढ़ा जाए तो--आ- की आवाज़ सुनाई देगा

जैसे

वा’द: = वादा [22]

पर्द: = पर्दा [22]

परवान: = परवाना [222]

करीन: = करीना [22 ]

और ऐसे ही बहुत से हज़ारो लफ़्ज़


मेरे मित्र को इसी बात पर शंका थी और उन्हे

इरादा--और वा’द: हमक़ाफ़िया नही लग रहा था।

ऐसे शब्द कभी- 21- की हैसियत रखते है तो कभी 22 की--जैसी बह्र और अर्कान की डिमांड हो।

इक़बाल साहब ने [ क़रीना ]और शाकिर साहिबा ने [वादा ] अपनी ग़ज़ल में इसे -22- पर बरता है ।

एक बात और--

चूंकि ग़ज़ल उर्दू की विधा है- बह्र-वज़न -रुक-अर्कान अरूज़ आदि सब उर्दू से ही प्रतिपादित है तो थोड़ा बहुत उर्दू व्याकरण -इमला आदि की भी जानकारी हो तो बेहतर।

[ इस मंच के असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो बराए मेहरबानी निशानदिहि फ़रमा दें ताकि मैं खुद को दुरुस्त कर सकूँ


-सादर-

-आनन्द.पाठक ’आनन-


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

चर्चा 009 : त्रिपदी -बनाम- मुसल्लस विधा

चर्चा  009  : त्रिपदी -बनाम- मुसल्लस विधा किसी मंच पर मैने अपनी एक दो त्रिपदी  लगाई थी-- प्यार मुहब्बत इश्क़ वफ़ा सब सुनने  में लगता है अच्छा ...